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तिहाड़ जेल की कैद से बाहर आकर नताशा नरवाल और देवांगना कलिता ने की मीडिया से बातचीत

स्टूडेंट एक्टिविस्ट नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ इकबाल को आखिरकार 17 जून को तिहाड़ जेल से जमानत पर छोड़ दिया गया. इनकी रिहाई तकरीबन एक साल तक जेल में बिताने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर हुई है. नागरिकता विरोधी कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन करने और दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में आतंकवाद विरोधी कानून UAPA के तहत इनकी गिरफ्तारी हुई थी. इंडिया टुडे के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई ने नताशा नरवाल और देवांगना कलिता से बातचीत की. आइए जानते हैं, उन्होंने क्या कहा-

नताशा नरवाल

जेल से बाहर आने पर

जेल से बाहर आने पर इतना मीडिया देखकर मुझे फिलहाल बहुत अच्छा लग रहा है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट में मामला अब भी पेंडिंग है. मैं उसके लिए दुआ मांग रही हूं. जिस तरह का फैसला दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनाया है, वह भारतीय न्याय व्यवस्था में भरोसा पैदा करता है. कोर्ट का फैसला हमें उम्मीद और ताकत देता है कि हम लोगों के विरोध करने के लोकतांत्रिक अधिकार के लिए खड़े हो सकते हैं.

अपने पिता को खो देने पर

अपने पिता को खोने का मुझे गुस्सा और दुख है. मुझे नहीं लगता कि इस साल इससे ज्यादा कठिन कुछ रहा हो. उनकी कोविड 19 से मौत हो गई, लेकिन मेरा जेल जाना भी उन्हें जरूर परेशान कर रहा था. मुझे इस महामारी में फेल हो चुकी स्वास्थ्य व्यवस्था की वजह से गई हर जान को लेकर गुस्सा है. मुझे उन सभी के लिए दुख है जिनके किसी करीबी की इस महामारी में जान गई है. अगर आज पिताजी जीवित होते तो बहुत खुश होते.

एंटी CAA प्रोटेस्ट में शामिल होने पर

मुझे CAA विरोधी प्रोटेस्ट में शामिल होने को लेकर कोई पछतावा नहीं है. मुझे इस मूवमेंट में विरोध के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करने, और सरकार से जवाब मांगने का पछतावा नहीं है. सबसे बड़ा दुख यही है कि हम इस विरोध प्रदर्शन को आगे नहीं ले जा सके. इसे बुरी तरह से कुचल दिया गया. मुझे लगता है कि दूसरे तरीकों से संघर्ष जारी रहेगा, और हमें न्याय मिलेगा.

जेल का अनुभव

मुझे नहीं पता कि जेल में बिताए वक्त ने मुझे कितना बदला है. यह बदलाव जानने और समझने में हमें अभी थोड़ा वक्त लगेगा. इस बात का अहसास जरूर हुआ है कि कैद में डाल देने की व्यवस्था कैसे काम करती है. यह कैसे उन सभी लोगों का अमानवीयकरण कर देती है, जो जेल के दरवाजों के अंदर हैं. जैसे कि वो अब इंसान नहीं हैं. उनके पास अब कोई अधिकार नहीं है.

जेल में उन बच्चों को देखना बहुत दुखद लगा जिन्होंने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी. जब कोई कैदी सुनता है कि रिहाई हो रही है तो वो अपने बैग पैक करना शुरू कर देता है. यह बहुत भावुक दृश्य होता है. इस बात को लेकर हमें बहुत नाराजगी है कि जो हमने पिछले एक साल में जेल में रहने के दौरान खोया है, मुझे नहीं लगता कि उसकी कुछ भी भरपाई कोई कर सकता है. खासतौर पर मेरे पिता की मौत. इस नुकसान की भरपाई कभी नहीं की जा सकती. मैं ऐसा सिर्फ अपने बारे में नहीं कह रही. जैसा कि मैं पहले भी कह चुकी हूं कि बहुत से लोगों के साथ ऐसा हुआ है, जैसा हमारे साथ हुआ है. कम से कम मुझे पिता की मौत के बाद बाहर जाने की इजाज़त मिली. लेकिन बहुत से ऐसे हैं, जिन्हें ऐसी सुविधा नहीं मिली. वो सब भी इंसान हैं. इस मुश्किल वक्त में अपने परिवार के साथ होना चाहते हैं. जेल में किसी को संपर्क के लिए बुलाना बहुत बड़ा संघर्ष है. बहुत से लोगों के पास तो कानूनी सहायता तक उपलब्ध नहीं है. मेरा गुस्सा सिर्फ मुझे कैद में रखने को लेकर नहीं है.

विरोधियों को संदेश

हम डरेंगे नहीं, चाहें वो हम पर किसी भी तरह से हमले कर लें. वो हमारे साथ जो सबसे बुरा कर सकते थे, कर चुके. और हम उससे बच गए हैं.

देवांगना कलिता

जेल से बाहर आने पर

इस बात पर अब भी भरोसा नहीं हो रहा कि हम जेल से बाहर आ गए हैं. इस मायने में कि हमारे बेल ऑर्डर 2 दिन पहले ही आ गए थे लेकिन फिर भी हमें जेल के भीतर रखा गया. यह सब अभी खत्म नहीं हुआ है. हम अब भी इस इंतजार में हैं कि सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा. लेकिन फिलहाल तो हम खुले आसमान के नीचे आजाद खड़े होकर अच्छा महूसस कर रहे हैं.

अपनी मां के बारे में

अपनी मां के अडिग समर्थन के बिना जेल का वक्त बिताना नामुमकिन था. उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाने के लिए जेल में चिट्ठियां लिखीं. शायद मैं उन्हीं के दिए मूल्यों की वजह से इस तरह जेल के गेट के बाहर एक स्वतंत्र महिला की तरह मजबूती से खड़ी हूं. उन्होंने सिखाया है कि किसी के सामने झुकना नहीं है.

प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने को लेकर

मुझे इस बात का कोई भी पछतावा नहीं है कि मैंने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया. जिसकी वजह से हम जेल गए. विरोध प्रदर्शन के वक्त जिन महिलाओं और प्रदर्शनकारियों ने हमारा समर्थन किया, उनकी दुआओं की वजह से ही हम आज जेल के बाहर हैं. और सबसे ज्यादा धन्यवाद दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का. मुझे लगता है कि राजनीतिक कैदी होने की वजह से हमारे केस को तवज्जो मिली. लेकिन बहुत से लोग जेल में हैं, जिनके ट्रायल लंबे वक्त से चल रहे हैं. जब कोर्ट नहीं चलते तो लोगों की जिंदगी अधर में लटकी रहती है.

जेल का अनुभव

अपने आसपास के लोगों की लाचारी देखना बहुत दुखद अनुभव रहा. वही लोग जेल में हैं, जिनके पास कोई कानूनी मदद नहीं है और वो पुलिस को रिश्वत देकर बच नहीं सके. अकथनीय दर्द और लाचारी. हमने जितना हो सका, उतना किया. उन लोगों के साथ दुख बांटा, जिनका कोई मर गया था. लेकिन रोने की आवाज, वो लोगों का चिल्लाना कि खोल दो, बाहर जाने दो. ये अन्याय है. इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

विरोधियों को संदेश

सारे पिंजरों को तोड़ेंगे, इतिहास की धारा मोड़ेंगे…

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