सूचना तकनीक अधिनियम (आईटी ऐक्ट) की एक धारा है 66ए. इसके इस्तेमाल को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने खासी नाराजगी जाहिर की है. क्यों? क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस धारा को 6 साल पहले निरस्त कर चुका है, फिर भी इसका इस्तेमाल लोगों के खिलाफ किया जा रहा है. इतने सालों बाद भी अपने जजमेंट का पालन ना होते देख सुप्रीम कोर्ट ने काफी तल्ख टिप्पणी की है. उसने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया है.
2015 से निरस्त है धारा 66ए
सुप्रीम कोर्ट ने आईटी ऐक्ट की इस धारा को 2015 में निरस्त कर दिया था. लेकिन पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की एक याचिका में बताया गया है कि पुलिस अब भी आईटी ऐक्ट के इस सेक्शन को लोगों के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है. इंडिया टुडे की रिपोर्टर अनीषा माथुर के मुताबिक, सोमवार 5 जुलाई को याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया. ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि ये हैरान करने वाला है कि इस कानून को निरस्त करने के उसके फैसले पर अभी तक अमल नहीं किया गया है.
PUCL ने इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन नाम की एक संस्था द्वारा इकट्ठा किए गए डेटा के आधार पर ये याचिका दायर की है. इसके मुताबिक, पुलिस आईटी ऐक्ट के उन ‘घातक’ प्रावधानों का अब भी इस्तेमाल कर रही है, जिन्हें अवैध करार दिया गया है. याचिका में PUCL ने कहा है,
ये बताता है कि 2015 में श्रेया सिंघल मामले में दिए गए फैसले के बाद भी धारा 66ए के तहत 1307 केस दर्ज किए गए हैं. मार्च 2021 तक इनमें से 745 मामले देश के 11 अलग-अलग जिला अदालतों में पेंडिंग थे.
कोर्ट ने PUCL की तरफ से पेश हुए वकील संजय पारिख से कहा,
आपको नहीं लगता कि ये बहुत हैरान और परेशान करने वाला है? श्रेया सिंघल मामले से जुड़ा जजमेंट 2015 में दिया गया था. ये वाकई में हैरान करने वाला है. जो कुछ भी चल रहा है वो खतरनाक है.
संजय पारिख ने अदालत से कहा कि 2019 के उसी के आदेश के मुताबिक, सभी राज्यों को 2015 के जजमेंट को लेकर पुलिस को जानकारी देनी चाहिए, लेकिन इसके बाद भी इस सेक्शन के तहत ‘हजारों’ केस रजिस्टर किए गए. इस पर कोर्ट ने कहा,
हां हमने इस संबंध में आंकड़े देखे हैं. आप चिंता ना करें. हम कुछ करेंगे.
क्या बोले अटॉर्नी जनरल?
सुनवाई में सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अदालत को बताया कि कानून की किताबों में आईटी ऐक्ट की धारा 66ए का जिक्र है. वेणुगोपाल ने कहा,
कानून की किताबों में इस धारा का अभी भी जिक्र है. अगर आईटी ऐक्ट की बुक देखें तो पता चलता है कि इसमें छोटे से फुटनोट के साथ लिखा है कि ये धारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत निरस्त कर दी गई है. और कोई भी फुटनोट नहीं पढ़ता.
केके वेणुगोपाल ने आगे कहा कि इस धारा में ये बात जोड़े जाने की जरूरत है कि इसे सुप्रीम कोर्ट ने अवैध करार दिया है ताकि पुलिस इसे लेकर कन्फ्यूज ना हो. उन्होंने कहा,
जब एक पुलिस अधिकारी केस रजिस्टर करता है तो वो सीधे सेक्शन देखता है. फुटनोट की तरफ उसकी नजर नहीं जाती. इसलिए सेक्शन 66ए के साथ ब्रैकेट में लिख दिया जाए कि ये कानून निरस्त हो चुका है. फुटनोट में हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरा टेक्स्ट डाल सकते हैं.
इस पर सुनवाई कर रही 3 सदस्यीय बेंच में शामिल न्यायाधीश आरएफ नरीमन ने कहा,
ये शर्मनाक है. आदेश का पालन एक समस्या बन गया है.
क्या कहती है धारा 66ए?
आईटी ऐक्ट की धारा 66ए ऐसे ऑनलाइन कम्युनिकेशन को लेकर इस्तेमाल की जाती थी, जो बेहद ऑफेंसिव हो. कानून के मुताबिक, अगर कम्युनिकेट करने वाले को पता हो कि इससे किसी को कष्ट, असुविधा या खतरा हो सकता है, या इससे किसी का अपमान हो सकता है तो उस पर 66ए लगाई जा सकती है. बुरी नीयत, नफरत या दुश्मनी की भावना से किए गए ऑनलाइन कम्युनिकेशन पर भी धारा 66ए लागू होती थी.
लेकिन साल 2012 में श्रेया सिंघल नाम की एक छात्रा ने इस धारा को कोर्ट में चुनौती दी. उन्होंने अपनी याचिका में इस धारा को लेकर कहा कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है. याचिका में आईटी ऐक्ट की धारा 66ए को संविधान की भावना के विरुद्ध भी बताया गया. 3 साल की सुनवाई के बाद मार्च 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को निरस्त कर दिया. कोर्ट ने अपने फैसले में इस प्रावधान को अस्पष्ट, संदिग्ध और मनमाना करार दिया था. ये कहते हुए कि उसे आश्चर्य है कि अब तक इस धारा को किसी ने चुनौती क्यों नहीं दी.



