5 जी नेटवर्क शुरू होने के साथ ही इसे लेकर खूब विवाद भी हो रहा है. पर्यावरणविदों का दावा है कि 5 जी नेटवर्क कैंसर के जोखिम को कई गुना बढ़ा देगा. लेकिन क्या यह सच है. दरअसल, 1990 में मोबाइल फोन का इस्तेमाल व्यापक होने लगा था. कहा गया कि मोबाइल फोन के टावर से निकले रेडियो फ्रीक्वेंसी के कारण ब्रेन कैंसर हो सकता है. हालांकि सेल फोन से जो रेडियो तरंगों का उत्सर्जन होता है वह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम के क्षेत्र में होता है. दूसरे, तीसरे और चौथे जेनरेशन को सेल फोन की फ्रीक्वेंसी 0.7 से2.7 गीगाहर्ट्ज तक रहती है. लेकिन 5 जी नेटवर्क में यह बढ़कर 80 गीगाहर्ट्ज तक पहुंच जाती है. तो क्या ज्यादा गीगाहर्ट्ज के कारण कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है.
WHO के अध्ययन में सबूत नहीं
इंडियन एक्सप्रेस की खबर में मुंबई के एक मशहूर अस्पताल के डॉ डेलनाज दाभर कहते हैं कि यह बहस हमेशा से एक मुद्दा रहा है लेकिन मोबाइल फोन से निकला रेडिएशन नॉन आयोनाइजिंग रेडियो वेव्स होता है. यह ऐसा ही होता है जैसे माइक्रोवेव से तरंगें निकलती है. इस मुद्दे को लेकर जब हंगामा हुआ तो डब्ल्यूएचओ ने इलेक्ट्रिक एंड मैग्नेटिक फील्ड को लेकर 1996 में एक पैनल का गठन किया. इसके बाद से कई रिसर्च हुई. इन रिसर्च में इस बात की पड़ताल की गई कि क्या मोबाइल फोन से निकले वेव्स से कैंसर हो सकता है. 2016 में इंडियन जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरनमेंटल मेडिसीन में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया कि इस तरह की कोई सत्यता नहीं है जिसमें यह साबित किया जा सके कि मोबाइल फोन से कैंसर होता है.
पूरी तरह सही नहीं
इसी तरह का दावा एमएसकेसी जर्नल में भी किया गया. सिर्फ ब्रिटेन के एक अध्ययन में दावा किया गया था कि सेल फोन के रेडिएशन से ब्रेन ट्यूमर हो सकता है. इसे ग्लियोब्लास्टोमा मल्टीफॉर्म कहते हैं. हालांकि यह अध्ययन भी किसी निश्चित परिणाम को साबित नहीं कर सका. डॉ डेलनाज दाभर ने कहा कि सेल्युलर फोन के बढ़ते इस्तेमाल को कैंसर के मामलों की बढ़ती संख्या के लिए जिम्मेदार ठहराना गलत है. उन्होंने बताया कि यह सही नहीं है 5 जी नेटवर्क से कैंसर की बीमारी होती है. क्योंकि जीवनशैली, बुरी लत, सूरज की रोशनी, कई अन्य वायरल संक्रमण से भी कैंसर हो सकता है.



