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सुप्रीम कोर्ट ने विनोद दुआ पे लगे राजद्रोह के मामले को किया ख़ारिज

सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ दर्ज राजद्रोह के मामले को खारिज कर दिया है. विनोद दुआ पर हिमाचल प्रदेश के शिमला में राजद्रोह के मामले में FIR दर्ज हुई थी. स्थानीय बीजेपी नेता श्याम ने आरोप लगाया था कि विनोद दुआ ने यूट्यूब पर अपने शो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर वोट पाने के लिए मौतों और आतंकी हमलों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया. जिसके बाद शिमला के कुमारसैन थाने में विनोद दुआ के खिलाफ IPC के प्रावधानों के तहत फर्जी खबरें फैलाने, लोगों को भड़काने, मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित करने का मामला दर्ज किया गया था.

FIR दर्ज होने के बाद विनोद दुआ ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. विनोद दुआ ने अपने ऊपर दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी. साथ ही पत्रकारों के खिलाफ दर्ज राजद्रोह के मामलों की जांच के लिए एक कमेटी बनाने की अपील भी की थी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में विनोद दुआ पर दर्ज FIR को निरस्त कर दिया. लेकिन कमेटी बनाने की मांग वाली उनकी दूसरी याचिका को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि यह विधायिका क्षेत्र पर अतिक्रमण की तरह होगा.

मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस विनीत सरन की बेंच ने कहा कि प्रत्येक पत्रकार केदार नाथ सिंह के फैसले के अंतर्गत सुरक्षा का हकदार है. कोर्ट ने केदारनाथ सिंह मामले का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह की धाराएं तभी लगनी चाहिए जब किसी की कोशिश शांति व्यवस्था को बिगाड़ने और अराजकता पैदा करने की हो.

क्या है केदारनाथ सिंह का मामला?

1962 में सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था. बिहार के रहने वाले केदारनाथ सिंह पर राज्य सरकार ने एक भाषण के मामले में राजद्रोह का मामला दर्ज किया था. मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने कहा था कि सरकार की आलोचना करने या प्रशासन पर कमेंट करने से राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता. ऐसा तभी किया जा सकता है जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक अंसतुष्टिकरण बढ़े.

देशद्रोह या राजद्रोह क्या है?

आइए थोड़ा सा सिडिशन यानी ‘राजद्रोह’ के बारे में भी जान लेते हैं.

सबसे पहले तो ये कि सिडिशन का शाब्दिक अर्थ होता है, सरकार के ख़िलाफ़ मानहानि करना या द्रोह कर देना. इसी से इसका हिंदी शब्द निकलकर आता है, राजद्रोह. हमारे देश में राजद्रोह को भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) की धारा 124A में शामिल किया गया है.

अगर धारा को सटीक शब्दों में लिखा जाए, तो वह कहती है-

“भारतीय दंड संहिता की धारा 124 A के अनुसार, लिखित या फिर मौखिक शब्‍दों, या फिर चिह्नों या फिर प्रत्‍यक्ष या परोक्ष तौर पर नफरत फैलाने या फिर असंतोष जाहिर करने पर दोषी को 3 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है, साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है.”

अब आप ये सोचेंगे कि मैंने सिडिशन के शाब्दिक अर्थ में आपको ये बताया कि इसका मतलब सरकार की अवमानना, पर यहां तो देश की अवमानना करने की बात लिखी गयी है. अगर हम धारा 124A को अंग्रेज़ी में पढ़ें, तो वह कहती है-

“Whoever, by words, either spoken or written, or by signs, or by visible representation, or otherwise, brings or attempts to bring into hatred or contempt, or excites or attempts to excite disaffection towards the Government established by law shall be punished with [imprisonment for life], to which fine may be added, or with impris-onment which may extend to three years, to which fine may be added, or with fine.”

माने कि हमको सबसे पहले सरकार की मानहानि और देश की मानहानि में अंतर समझना पड़ेगा. सरकार की मानहानि करना होता है ‘राजद्रोह’, वहीं देश की मानहानि करना होता है ‘देशद्रोह’.

अब सबसे अहम जो बात है, वो यह कि ‘सिडिशन’ होता है ‘राजद्रोह’ ही. लेकिन लोगों ने राजद्रोह और देशद्रोह के भेद को दरकिनार कर, सरकार को ही देश बना दिया. हुआ ये कि आधी आबादी को ऐसा लगता है कि सिडिशन, देशद्रोही के खिलाफ कड़ाई करने के लिए बनाया गया क़ानून है.

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