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भारत में कोरोना का नया वैरिएंट- दूसरी लहर अब कई ज़्यादा ख़तरनाक

भारत में कोरोना का नया वैरिएंट क्या दूसरी लहर को कहीं ज़्यादा ख़तरनाक बना रहा है? क्या यह दुनिया भर में फैल रहा है और क्या यह वैश्विक ख़तरा बन चुका है?

भारतीय वैज्ञानिक फ़िलहाल इस बात को लेकर निश्चिंत नहीं हैं कि कथित डबल म्यूटैंट वायरस, जिसे आधिकारिक तौर पर बी.1.67 कहा जा रहा है, उसकी वजह से संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

इसकी एक वजह तो यही है कि अभी भारत में पर्याप्त जीनोम सीक्वेंस के लिए सैंपल एकत्रित नहीं हो पाए हैं. हालांकि महाराष्ट्र में एकत्रित किए गए सीमित सैंपल में से 61% मामलों में यह वैरिएंट पाया गया है.

हालांकि भारत और ब्रिटेन के बीच हवाई यात्रा जारी रहने के चलते यह वैरिएंट ब्रिटेन तक भी पहुंचा. इस सप्ताह की शुरुआत में ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्री मैट हेनकॉक ने कहा कि 103 संक्रमितों में भारतीय वैरिएंट पाया गया है.

इसके बाद ही भारत को ब्रिटेन उन देशों की सूची में डाल दिया जहां से ब्रिटेन की यात्रा नहीं हो सकती है. हालांकि जीआईएसएआईडी के डेटाबेस के मुताबिक़ इस भारतीय वैरिएंट की पहचान अब तक कम से कम 17 देशों और अमेरिका के 15 राज्यों में हो चुकी है.

कोशिश में जुटे वैज्ञानिक

वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे कि क्या दो म्यूटेशन- ई484Q और एल452आर- एक साथ नए वैरिएंट में आ गया है, क्या यह ज़्यादा संक्रामक है और इस पर वैक्सीन का कम असर है.

वैज्ञानिक इन बदलावों का पता वायरस के जीनोम सीक्वेंस के अध्ययन से करते हैं, जिसे संक्रमित मरीज़ों के स्वॉब से लिया जाता है. वे वायरस के जेनेटिक कोड को तोड़ते हैं और फिर म्यूटेशन को ट्रैक करते हैं.

इन म्यूटेशनों का अधिकांश हिस्सा बहुत महत्व नहीं रखते और ना ही वे वायरस के व्यवहार को बदलते हैं. लेकिन ई484क्यू जैसे म्यूटेशन वायरस को ख़तरनाक बना देते हैं.

लुसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी हेल्थ साइंस सेंटर शर्वेपोर्ट के डॉ. जर्मी कामिल ने बताया कि ई484क्यू काफ़ी हद तक ई484के से मिलता है. ई484के म्यूटेशन, साउथ अफ्रीका और ब्राज़ील में मिला वैरिएंट है और यह स्वतंत्र रूप से कई बार उभरा है. यह शरीर के अंदर प्रतिरोधी क्षमता एंटी बॉडी को नष्ट करने में वायरस की मदद करता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन में कोविड के टेक्नीकल लीड ऑफ़िसर मारिया वेन केरखोवे ने बताया, “यह वैरिएंट दिलचस्प है. इन दो म्यूटेशनों का होना और इसे दुनिया के दूसरे वैरिएंटों में भी देखा जाना चिंतित करने वाला है.”
भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा, “ऐसे डबल म्यूटेशन प्रतिरोधी क्षमता को दूर करते हैं और संक्रमण की आशंका को बढ़ाते हैं.”

वैज्ञानिकों के मुताबिक़ भारतीय वैरिएंट को लेकर अब तक पर्याप्त आँकड़े जमा नहीं हुए हैं. डॉ. कामिल के मुताबिक़ भारत में दूसरे वैरिएंट का पहला मामला अक्टूबर में सामने आया था, दुनिया भर में इस वैरिएंट के मामले 400 से भी कम मिले हैं.

तुलनात्मक अध्ययन

जीआईएसएआईडी डेटा बेस में अब तक दुनिया भर के रिसर्चरों ने भारतीय वैरिएंट कोरोना के 656 जीनोम सीक्वेंस शेयर किए हैं. भारत ने अब तक जो 8,170 जीनोम सीक्वेंस शेयर किए हैं, उसमें से केवल 298 सीक्वेंस भारतीय वैरिएंट के हैं.

इसकी तुलना में दुनिया भर के वैज्ञानिकों की ओर से साझा किए गए जीनोम में तीन लाख 84 हज़ार सीक्वेंस ब्रिटिश वैरिएंट के हैं, जिसे आधिकारिक तौर पर बी.1.1.7 कहा जाता है.

डॉ. कामिल ने कहा, “भारतीय वैज्ञानिकों ने अब तक जीनोम शेयरिंग की दिशा में कोई अच्छा काम नहीं किया है. यह शर्मनाक स्थिति है क्योंकि अगर ये सीक्वेंस रियल टाइम फ्रेम में शेयर किए जाते तो भारत और दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए सबसे मूल्यवान होते.”

वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत और यहां तक कि अमेरिका को भी ज़्यादा से ज़्यादा सीक्वेंस शेयर करने चाहिए और उसकी निगरानी करनी चाहिए.
इसका एक तरीक़ा तो यह हो सकता है कि ग़रीबों को सशक्त किया जाए और समाज के हाशिए के लोगों में भरोसा उत्पन्न किया जाए या फिर उन्हें बीमार होने पर, भले ही लक्षण कम हीं हों, लेकिन उन्हें कुछ इंसेंटिव देकर सैंपल देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए.

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में क्लिनिकल माइक्रोबॉयोलॉजी के प्रोफेसर रवि गुप्ता ने बताया कि उनकी प्रयोगशाला में भारतीय वैरिएंट के कोरोना वायरस के बारे में ज़्यादा जानकारी हासिल करने की कोशिश हो रही है.

ब्रिटिश सरकार को कोरोना वायरस के नए वैरिएंट को लेकर सलाह देने वाले वैज्ञानिकों में शामिल प्रो. गुप्ता ने कहा, “भारतीय वैरिएंट इसलिए चिंतित करने वाला है क्योंकि इसमें दोनों ख़तरनाक म्यूटेशन मौजूद हैं. इन दोनों म्यूटेशन को दुनिया के अलग अलग हिस्सों में पाया गया है और ये दोनों आम लोगों की प्रतिरोधी क्षमता पर विपरीत प्रभाव डालते हैं.”

प्रोफ़ेसर रवि गुप्ता के मुताबिक़ ये म्यूटेशन भारत में वायरस के अनियंत्रित प्रसार का नतीजा हैं.

उन्होंने कहा, “भारत की बड़ी आबादी और आबादी का घनत्व वायरस के म्यूटेशंस के लिए उपयुक्त स्थिति मुहैया कराता है.” 15 अप्रैल के बाद से भारत में प्रतिदिन दो लाख से ज़्यादा संक्रमित सामने आ रहे हैं, संक्रमित लोगों की मौत की संख्या भी लगातार बढ़ रही है.

प्रोफ़ेसर गुप्ता ने कहा, “यह वैरिएंट दूसरे वैरिएंट की तुलना में ज़्य़ादा ख़तरनाक है या नहीं है, इसको लेकर लोगों को ज़्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए. संक्रमण के ज़्यादा मामले सामने आने से गंभीर रूप से संक्रमित मरीज़ों की संख्या बढ़ेगी, इस बात को लेकर लोगों को चिंतित होनी चाहिए. अगर अस्पतालों में जगह नहीं होगी तो संक्रमितों को इलाज नहीं मिलेगा और ऐसी स्थिति में ज़्यादा लोगों की मौत होगी.”

डॉ. कामिल के मुताबिक़, किसी भी वैज्ञानिक के लिए भारतीय वैरिएंट दुनिया का सबसे ख़तरनाक वैरिएंट बताना प्रीमैच्योर स्थिति होगी. इस वक्त दुनिया में सबसे ज़्यादा चिंता ब्रिटिश वैरिएंट को लेकर है, जो ब्रिटेन के अधिकांश हिस्से को चपेट में ले चुका है और दुनिया के 50 से ज़्यादा देशों में फैला हुआ है. डॉ. कामिल ने कहा, “ब्रिटिश वैरिएंट से ज़्यादा ख़तरनाक भारतीय वैरिएंट है, इस बात में मुझे संदेह है और हमें घबराना नहीं चाहिए.”

आख़िर में, वैज्ञानिकों के मुताबिक़ वैक्सीन से वैरिएंट को भी रोकने में मदद मिलेगी. नेचर पत्रिका में प्रोफ़ेसर गुप्ता और उनके साथी रिसर्चरों के प्रकाशित शोध अध्ययन के मुताबिक़ कुछ वैरिएंट निश्चित तौर पर इन वैक्सीनों से बच जाएंगे और ऐसे वैरिएंट पर नियंत्रण अगली पीढ़ी की वैक्सीनों और वैकल्पिक वायरल एंटीजन के इस्तेमाल से हो पाएगा.

बहरहाल अभी भी संक्रमण की स्थिति को कम करने की दिशा में वैक्सीनेशन सबसे महत्वपूर्ण है.

डॉ. कामिल ने बताया, “ज़्यादातर लोगों को लिए वैक्सीन, बीमारी और अस्पताल में मौत के ख़तरे बचाव है. इसलिए जो वैक्सीन उपलब्ध हो, वह लेनी चिहए. इसमें किसी तरह की हिचक नहीं होनी चाहिए और ना ही किसी आदर्श कारगर वैक्सीन का इंतज़ार करना चाहिए.”

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