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भारत की कोरोना से हो रही मौतों का आंकड़ा कितनी हद तक सही ?

गंगा में तैरती लाशों का भयावह दृश्य हम सब के लिए एक शर्मसार करने वाला वाक़या था. और फिर जब सरकारें कोरोना वायरस (covid deaths) सी हुई मौतों का आंकडा जारी करती हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि लोग इस पर विश्वास नहीं करते हैं. विशेषज्ञों की मानें, तो ना सिर्फ़ भारत, बल्कि अलग-अलग देश कोरोना वायरस से हुई लोगों की मौत के जो आंकड़े जारी करते हैं उसमें और वास्तव में मारे गए लोगों की तादाद में बहुत बड़ा फ़र्क़ है. फिर सही मायने में कोरोना वायरस के कारण भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में हुई मौतों की सही संख्या के बारे में कैसे पता लगाएं? तो आइए जानते और समझते हैं ऐसी संस्थाओं के बारे में जो दुनियाभर में हुई मौतों का डेटा इक्कठा करती है, क्या उनका तरीक़ा है और इन सब में भारत की क्या स्थिति है. हालांकि ये सब समझने से पहले ये भी बताना ज़रूरी है कि इन संस्थाओं के द्वारा जारी आंकडे सिर्फ़ एक अनुमान हैं.

संस्था और उनके आंकड़े

वैसे तो कई देशों के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध हैं और कइयों के नहीं, लेकिन इसके बावजूद दो तरह के अनुमानित आंकड़े अब तक दुनियाभर में जारी किए गए हैं. पहला है वर्ल्ड मॉर्टैलिटी डाटासेट. ये डटासेट 89 देशों में सभी कारणों से मरे लोगों की मृत्यु दर का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय डेटासेट है. इनके जारी किए गए आंकड़ो के मुताबिक़ इन 89 देशों में वास्तव में COVID-19 से हुई मौतों की संख्या 1.6 गुना अधिक है रिपोर्ट हुई मौतों की संख्या से. इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इस डेटासेट के बाहर जो देश हैं उनमें अंडर काउंटिंग बहुत अधिक होने की संभावना है. और आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारत इस डेटासेट का हिस्सा नहीं है.

दूसरा आंकडा जारी किया है, इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (IHME) ने. IHME को दुनियाभर में इस क्षेत्र में सबसे भरोसेमंद माना जाता है. ये जारी किए गए आंकड़े 3 मई, 2021 तक COVID-19 से होने वाली मौतों के हैं. इनके मुताबिक़ दुनियाभर में मारे गए लोगों की संख्या 6.93 मिलियन है, जो कि अलग-अलग देशों द्वारा जारी की गई 3.24 मिलियन मौतों की आधिकारिक संख्या से दो गुना अधिक है. और भारत इसमें दूसरे स्थान पर है. कुल हुई मौतों का 10 प्रतिशत हिस्सा भारत का है. भारत में अनुमानित मौत हैं 7,36,811 जो रिपोर्ट किए गए आधिकारिक आंकड़े 2,48,016 से लगभग तीन गुना अधिक है.

वैसे को WHO यानी की वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन भी मौतों के आंकड़े जारी करता है. हालांकि WHO की वेबसाइट में आख़िरी आंकड़े साल 2018 के हैं. लेकिन WHO ने कोरोना वायरस से हुई मौतों की डेटा उपलब्धता के आधार पर देशों को तीन खेमे में बांटा है. पहले वे देश हैं जिनके पास अच्छा डेटा उपलब्ध है और कोरोना वायरस से हुई ज़्यादा मौतों का अनुमान लगाना संभव है. जैसे की वर्ल्ड मॉर्टैलिटी डेटासेट के 89 देश. दूसरा उन देशों का समूह है, जिनका डेटा वैसे तो बहुत अच्छा नहीं है, लेकिन अलग-अलग सरकारी संस्थाओं के माध्यम से डेटा इक्कठा कर अनुमान लगाया जा सकता है. और तीसरे वो देश हैं जिनके आंकड़ो को WHO विश्वास योग्य नहीं मानता है. दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले देश, भारत और चीन इस तीसरे खेमे में आते हैं.

डेटा और आंकलन

डेमोग्राफ़ी पर आंकड़े इकट्ठा करने वाली दुनिया में नामी गिरामी कुछ संस्थाएं हैं, जैसे की मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फ़ॉर डेमोग्राफ़िक रीसर्च और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले यूनिवर्सिटी और जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी डेटा इकट्ठा करती हैं. इसके अलावा ह्यूमन मॉर्टैलिटी डेटाबेस है और अलग-अलग देशों के राष्ट्रीय सांख्यिकीय संगठन द्वारा जारी किए गए आंकड़ो को मिलाकर डेटा इकट्ठा किया जाता है.

आंकलन और अनुमान के लिए तो कई फ़ॉर्म्युले और तकनीक का इस्तेमाल होता है और उसको समझना किसी मैथेमैटिक्स या स्टैटिस्टिक्स के क्लास जैसा होगा. आसान शब्दों में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि इस प्रक्रिया में कोरोना वायरस के प्रकोप से पहले, पिछले पांच सालों में हुई मौतों का औसत निकाला जाता है. और कोरोना वायरस के बाद हुई कुल मौतों से इसका फ़र्क़ देखा जाता है. औसत से ज़्यादा हुई मौतों को कोरोना से हुई मौत मानते हैं. तो ज़ाहिर है कि वास्तविकता से ये आंकड़े भी कम ही होंगे, हालांकि ये संस्था भी खुद ही इन्हें अनुमानित आंकड़े बताती है.

भारत के आंकड़े

अपने अभी पढ़ा कि भारत के आंकड़ो को लेकर काफ़ी विवाद है. हालांकि भारत में कई शहरों और राज्यों के आंकड़े अच्छी तरह से पंजीकृत किए जाते हैं. तरीक़ा है सिविल रेजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी की नागरिक पंजीकरण प्रणाली जिसके तहत जन्म और मृत्यु दोनों के आंकड़े दर्ज़ होते हैं. ऐसा ही एक उदाहरण केरल का है. केरल सरक़ार की सिविल रेजिस्ट्रेशन की वेबसाइट  हर रोज़ अपडेट होती है. ये केरल सरकार की लोकल सेल्फ़ गवर्न्मेंट डिपार्टमेंट के अंतर्गत आता है. इसमें न सिर्फ़ राज्य, बल्कि ज़िले तक के आंकड़े दिए गए हैं. वेबसाइट के मुताबिक़ 20 मई, 2021 की सुबह 5 बजे तक साल 2021 में राज्य भर में कुल 1,07,294 लोगों का जन्म हुआ और 74,707 लोगों की मृत्यु हुई. वहीं अगर पिछले सालों के आंकड़ो की तुलना 2020 में हुई मौतों से करें तो 2020 में मौतों में गिरावट देखने को मिलती है.

शहरों में ग्रेटर मुंबई नगर निगम, मुंबई क्षेत्र में 2020 के दौरान 22 प्रतिशत अधिक मौतें हुईं है. जहां 2018 में 88,852 मौतें हुईं थीं, वहीं 2019 में ये बढ़कर 91,223 हो गईं और 2020 में ये आंकडा 1,11,942 रहा था.

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस (एम्स) में कम्यूनिटी मेडिसिन के प्रोफ़ेसर डॉ आनंद कृष्णन ने अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में लिखे एक लेख में दावा किया है कि उनकी टीम ने हरियाणा के फरीदाबाद जिले के नागरिक पंजीकरण प्रणाली (सीआरएस) के आंकड़ो का विश्लेषण किया, जो पिछले कुछ वर्षों में मौतों के 100 प्रतिशत पंजीकरण की रिपोर्ट कर रहा है. उन्होंने पाया कि 2020 में 2016-19 की तुलना में 7 प्रतिशत अधिक मौतें हुई थी.

वहीं एक संस्था, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) द्वारा 2,32,000 घरों से लिए गए आंकड़ो में पाया गया कि मई और अगस्त 2020 के बीच सभी कारणों से होने वाली मौतों की संख्या पिछले सालों की तुलना में लगभग दोगुनी है.

ये सभी आंकड़े पिछले वर्षों की तुलना में रिपोर्ट की गई अतिरिक्त मौतों की संख्या पर आधारित अनुमान हैं.

एम्स के डॉ आनंद कृष्णन का मानना है कि पिछली महामारियों में मौतों के आकलन का अनुभव दर्शाता है कि अलग-अलग एजेंसियां अलग-अलग अनुमान जारी करते हैं, जिससे पॉलिसी मेकर्स यानी की नीति निर्माताओं और जनता के बीच भ्रम पैदा होता है. इन आंकड़ो में फ़र्क़ अलग-अलग तरह की कमियों और स्टैटिस्टिकल एनालिसिस के तरीक़ों में अंतर के कारण होता हैं. इस वजह से वो सुझाव देते हैं कि देशों को अपने नागरिक पंजीकरण प्रणाली को दुरुस्त करने पर काम करने की ज़रूरत है, इसके साथ-साथ शिक्षाविद स्टैटिस्टिकल एनालिसिस के तरीक़ों के सुधार पर काम करें तो सही आंकडो के क़रीब पहुंचा जा सकता है.

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