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बाजार में बाकी कंपनियां नुकसान में तो क्यों हो रहा जियो को अधिक फायदा?

एशिया के सबसे अमीर शख़्स मुकेश अंबानी उस टेलीकॉम कारोबार पर दाँव लगाकर मालामाल हो रहे हैं, जिसमें उनके छोटे भाई और अब कुमार मंगलम बिड़ला ‘बर्बाद’ हो चुके हैं.

सवा अरब से अधिक की आबादी, क्या ग़रीब और क्या अमीर तकरीबन हर हाथ में मोबाइल. दिन पर दिन अपडेट होती तकनीकी. दुनिया के इस सबसे बड़े टेलीकॉम बाज़ार में मुनाफ़ा कमाने के लिए भला किस कारोबारी का जी नहीं ललचाएगा?

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है. इसी टेलीकॉम कारोबार ने पहले रिलायंस कम्युनिकेशंस (आर-कॉम) के मालिक अनिल अंबानी की बर्बादी की कहानी लिखी और अब देश के जाने-माने कारोबारी और वोडोफ़ोन इंडिया के प्रमोटर कुमार मंगलम बिड़ला की परेशानी का सबब बना हुआ है.

वह कुमार मंगलम बिड़ला जो हिंडाल्को, अल्ट्राटेक सीमेंट, ग्रासिम इंडस्ट्रीज़, सेंचुरी टेक्सटाइल्स जैसी नामी कंपनियों के प्रमोटर्स हैं.

घाटे में चल रही बिड़ला की आइडिया ने कुछ साल पहले ब्रितानी कंपनी वोडाफ़ोन में साझेदारी कर सेक्टर में वापसी का दम भरा था, लेकिन उनका ये दाँव भी काम नहीं आ रहा.

वायरलेस कारोबार में तकरीबन 25 फ़ीसदी की हिस्सेदारी रखने वाली इस कंपनी को बैंकों का हज़ारों करोड़ रुपए का कर्ज़ तो चुकाना ही है, साथ ही 58 हज़ार करोड़ रुपए की सरकारी देनदारी भी इस पर है. ये देनदारी एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू यानी एजीआर की है.

एजीआर की देनदारी ने निकाला दम

एजीआर को लेकर टेलीकॉम कंपनियों और भारत सरकार के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है.

आसान भाषा में कहें, तो टेलीकॉम कंपनियाँ जो पैसा कमा रही हैं, उसका एक हिस्सा उन्हें टेलीकॉम विभाग को भी देना है. यही एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू या एजीआर है. साल 2005 से ही एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू की परिभाषा को लेकर सरकार और टेलीकॉम कंपनियों के बीच मतभेद हैं.

कंपनियाँ चाहती हैं कि केवल टेलीकॉम कारोबार से होने वाली कमाई को ही इस मकसद के लिए गिना जाए लेकिन सरकार इसे बड़े दायरे में देखती है.

सरकार का कहना है कि ग़ैर टेलीकॉम बिज़नेस जैसे परिसंपत्तियों की बिक्री या डिपॉजिट्स पर मिलने वाले ब्याज़ को भी इसमें गिना जाए. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और कोर्ट ने सरकार की दलीलों से सहमत होकर टेलीकॉम कंपनियों को एजीआर चुकाने का फ़रमान सुना दिया.

इस देनदारी का कोई रास्ता सूझता न दिख आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला वोडाफोन आइडिया लिमिटेड में प्रमोटर हिस्सेदारी छोड़ने को तैयार हैं. इस कंपनी में उनकी 27 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.

इस मुद्दे को लेकर कुमार मंगलम बिड़ला ने जून के आखिर में केंद्रीय कैबिनेट सचिव राजीव गाबा को एक खत लिखा और कहा कि अस्तित्व बचाने के लिए वह कंपनी में अपनी हिस्सेदारी किसी सरकारी या घरेलू फाइनेंशियल कंपनी को देने को तैयार हैं.

दिलचस्प ये है कि बिड़ला की पूरी हिस्सेदारी बेचकर भी सरकार अपना आधा पैसा भी नहीं वसूल सकती क्योंकि मौजूदा समय में कंपनी का बाजार पूंजीकरण यानी मार्केट कैपिटल क़रीब 24,000 करोड़ रुपए है.

कुमार मंगलम बिड़ला का कहना है कि कंपनी की आर्थिक सेहत सुधरनी चाहिए, इसके लिए सरकार को विदेशी निवेशकों को भरोसे में लेना चाहिए. वोडाफ़ोन आइडिया से देश के 27 करोड़ लोग जुड़े हैं.

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वोडाफ़ोन इंडिया पर एजीआर की कुल देनदारी 58,254 करोड़ रुपए है. इसमें से कंपनी 7,854 करोड़ रुपए का भुगतान कर चुकी है और उस पर अभी करीब 50,399 करोड़ रुपए का बकाया है.

कंपनियाँ क्या नहीं कमा पा रहीं मुनाफ़ा?

भारत में टेलीकॉम सेक्टर में तीन कारोबारियों ने धमाकेदार एंट्री ली. भारती एयरटेल, रिलायंस कम्युनिकेशंस और आइडिया. इसके अलावा दो सरकारी कंपनियाँ बीएसएनएल और एमटीएनएल तो पहले से थी हीं. होना तो ये चाहिए था कि जैसे-जैसे इस सेक्टर में ग्रोथ होती, वैसे-वैसे कंपनियों का मुनाफ़ा भी बढ़ता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

टेलीकॉम सेक्टर में लगातार ग्रोथ रही, लेकिन प्राइस वॉर, महंगा स्पेक्ट्रम, दिन पर दिन अपडेट होती तकनीकी और कुछ कंपनियों में कुप्रबंधन ने उनकी माली हालत ख़राब कर दी.

टेलीकॉम एक्सपर्ट महेश उप्पल कहते हैं, “ये इस सेक्टर की ही दिक़्क़त है. सरकारी नियमों, रेग्युलेशन के नियमित नहीं होने के कारण कुछ कंपनियों को समस्या हुई तो कुछ को इसका फ़ायदा भी मिला. हालाँकि ये नहीं कह सकते कि सरकार ने कंपनियों के साथ जानबूझकर भेदभाव किया.”

वे कहते हैं, “रिलायंस जियो समेत जिन कंपनियों के कारोबार दूसरे सेक्टर्स में भी थे, वो काफ़ी समय तक नुकसान झेलने की स्थिति में थे. उन्होंने कॉल रेट, डेटा रेट घटाए और दूसरी कंपनियों पर दबाव बनाया. घाटे के बावजूद प्रतिद्वंद्वी दाम बढ़ा नहीं सकते थे क्योंकि उन्हें डर था कि वो अपने ग्राहक गंवा देंगे.”

जानकारों का मानना है कि टेलीकॉम सेक्टर में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी भी नई कंपनियों के लिए वरदान साबित हुई.

उप्पल कहते हैं, “मोबाइल पोर्टेबिलिटी का फ़ायदा ये रहा कि ग्राहक नंबर बदले बिना उस कंपनी की सेवाएं ले सकता है जो कम रेट पर बेहतर सेवाएँ दे रही है. जियो केवल 4G तकनीकी पर सेवाएँ देती है जबकि दूसरी कंपनियाँ 2G, 3G नेटवर्क चलाती हैं. यही वजह है कि उसकी कॉल लागत कम है.”

कंपनियों के देनदारी के दलदल में फँसने की एक और बड़ी वजह रही, समय पर सही फ़ैसले नहीं कर पाना. उप्पल कहते हैं, “कई टेलीकॉम कंपनियाँ सरकार के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई पर ही भरोसा किए रहीं. उन्होंने खातों में इस बात की प्रॉविजनिंग ही नहीं की कि अगर उन्हें एजीआर की रकम चुकानी पड़े तो वो कैसे चुकाएँगे.”

हालाँकि टेलीकॉम सेक्टर के एक और एक्सपर्ट मनोज गैरोला का कहना है कि नियम-क़ानूनों से ज़्यादा कंपनियों का कुप्रबंधन उनकी बर्बादी की बड़ी वजह है.

गैरोला कहते हैं, “अगर सेक्टर में दिक्कत होती तो एयरटेल और जियो कैसे पैसा कमा रहे हैं. ये सही है कि जियो उस दौर में टेलीकॉम सेक्टर में उतरी है. जब उसके पास 2जी और 3जी स्पेक्ट्रम की देनदारी नहीं है. लेकिन उसने नेटवर्क और तकनीकी पर बड़ा निवेश किया है “

जियो का मुनाफ़ा एयरटेल के 10 गुने से भी अधिक

रिलायंस जियो ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 3651 करोड़ रुपए का मुनाफ़ा कमाया, जबकि भारती एयरटेल ने बताया कि इस दौरान उसे 284 करोड़ रुपए का मुनाफ़ा हुआ है. वहीं वोडाफ़ोन आइडिया का पहली तिमाही में नुक़सान 7000 करोड़ रुपए से अधिक का रहा.

गैरोला कहते हैं, “जो भी कंपनियाँ मुनाफ़ा कमा रही हैं, उनका प्रबंधन सही है, वो लगातार अपडेट हो रही तकनीकी में निवेश कर रही हैं. लेकिन वोडाफ़ोन आइडिया जैसी कंपनियों में मिसमैनेजमेंट की समस्या है और यही वजह है कि उसके हाई पे सब्सक्राइबर में भारी कमी आई है. जहाँ तक बीएसएनएल और एमटीएनएल की बात है तो सरकार तो ख़ुद ही नहीं चाहती कि वो निजी कंपनियों का मुक़ाबला करें. इन कंपनियों ने तो 4जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में भी हिस्सा नहीं लिया था.”

मुकेश अंबानी मालामाल

साल 2019 तक रिलायंस जियो के पास सिर्फ़ 35 करोड़ उपभोक्ता थे. माना जा रहा है कि वोडाफ़ोन आइडिया को हो रहे नुकसान से जियो को ही सबसे ज़्यादा फ़ायदा हो रहा है.

जानकारों का अनुमान है कि साल 2022 तक जियो अपना मुनाफ़ा दोगुना कर लेगी और तब तक कंपनी के उपभोक्ताओं की संख्या भी 50 करोड़ पार कर जाएगी.

अभी ब्रॉडबैंड में जियो के पास कुल बाज़ार का 54 फ़ीसदी हिस्सा है, जबकि मोबाइल ग्राहकों में उसकी हिस्सेदारी सबसे अधिक 35 फ़ीसदी है.

मुकेश अंबानी ने अपनी फ्लैगशिप कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के तहत रिलायंस जियो में निवेश किया और तीन-चार साल में ही दुनिया के निवेशकों को दिखाया कि ये कारोबार कितना मुनाफ़े का सौदा हो सकता है.

टेलीकॉम एक्सपर्ट गैरोला कहते हैं, “मुकेश अंबानी की ये रणनीति बेहद कारगर रही. पहले जियो की टेक्नोलॉज़ी और नेटवर्किंग पर लाखों करोड़ का निवेश किया और जब नतीजा दुनिया ने देखा तो देखते ही देखते उनके टेलीकॉम कारोबार में 30 अरब डॉलर से अधिक का निवेश हो गया.”

रिलायंस जियो में निवेश करने वालों में फ़ेसबुक, जनरल अटलांटिक, सिल्वर लेक पार्टनर्स, केकेआर जैसी दिग्गज कंपनियाँ शामिल हैं. मुकेश अंबानी की इस रणनीति ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को एक ही झटके में कर्ज़मुक्त कर दिया है.

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