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क्या है मशहूर गीतकार किशोर कुमार की कहानी?

किशोर कुमार के बारे में एक क़िस्सा मशहूर है कि वह खंडवा से बंबई अभिनेता बनने आए थे. उस समय उनके बड़े भाई अशोक कुमार बंबई फ़िल्म उद्योग के चोटी के अभिनेता थे.

एक बार वो अशोक कुमार के बॉम्बे टॉकीज़ वाले दफ़्तर गए. उस दफ़्तर के अहाते में वो सहगल का एक गाना गुनगुना रहे थे कि मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश ‘ज़िद्दी’ फ़िल्म की धुन पर काम करने के बाद थोड़ा आराम करने के लिए बाहर निकल आए.

जैसे ही उन्होंने किशोर को गुनगुनाते सुना उन्होंने उनसे अंदर आकर मिलने के लिए कहा. जब वो अंदर आए तो उन्होंने उनके सामने हारमोनियम रखा और वो गीत गाने के लिए कहा जो वो बाहर गा रहे थे.

थोड़ी देर सुनने के बाद उन्होंने किशोर को ऑफ़र किया कि क्या वो उनकी फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ के लिए गाना गाएंगे?

किशोर इसके लिए तुरंत तैयार हो गए. जिस दिन रिकॉर्डिंग थी, खेमचंद ने अशोक कुमार और फ़िल्म के हीरो देवानंद को किशोर कुमार को सुनने के लिए बुलवा भेजा. पहले ही दिन किशोर का गाना ओके कर दिया गया. साल था 1948.

नौशाद और सी रामचंद्र से हुई चूक

लेकिन किशोर उन्हीं खेमचंद के असिस्टेंट रहे नौशाद से वो सम्मान नहीं प्राप्त कर सके.

किशोर कुमार के प्लेबैक करियर के पहले 27 सालों में नौशाद ने उन्हें एक बार भी अपने लिए गाने के लिए आमंत्रित नहीं किया, जबकि किशोर कुमार की दिली इच्छा थी कि वो नौशाद के लिए एक बार ज़रूर गाएं.

आख़िर में किशोर के सुपरसिंगिंग स्टार बन जाने के पूरे पाँच साल बाद 1974 में नौशाद ने फ़िल्म ‘सुनहरा संसार’ में किशोर कुमार से एक गाना गवाया, वो भी आशा भोसले के साथ एक डुएट.

उसी तरह मशहूर संगीतकार सी रामचंद्र ने भी अपनी फ़िल्म ‘साजन’ में किशोर कुमार को गवाने से ये कहते हुए इनकार कर दिया था कि मैं ऐसे शख़्स पर अपना समय क्यों बरबाद करूँ जिसे फ़िल्म संगीत और गाने के बारे में कुछ भी पता नहीं है.

लेकिन नौशाद और सी रामचंद्र के ठीक विपरीत सचिन देव बर्मन ने किशोर की प्रतिभा को 1952 में ही पहचान लिया था.

बॉम्बे टाकीज़ के दफ़्तर में यूँ ही गाना गा रहे किशोर कुमार के बारे में अपने बेटे पंचम को बताते हुए उन्होंने कहा था, “ये दादामुनि का छोटा भाई आभास है. थोड़ा सनकी है, लेकिन इसमें बहुत प्रतिभा है. आने वाले दिनों में तुम इसके बारे में बहुत कुछ सुनोगे.”

किशोर का प्ले बैक हेमंत कुमार ने दिया

किशोर को बंबई फ़िल्म उद्योग में अपने पैर जमाने के लिए ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा. साल 1954 में बिमल रॉय ने किशोर कुमार को फ़िल्म ‘नौकरी’ में बतौर अभिनेता साइन किया. किशोर मान कर चल रहे थे कि फ़िल्म के गाने भी वही गाएंगे.

लेकिन वो ये जानकर दंग रह गए कि संगीतकार सलिल चौधरी ने उनके गाने गाने के लिए हेमंत कुमार को आमंत्रित कर डाला.

मशहूर पत्रकार राजू भारतन अपनी किताब ‘अ जर्नी डाउन मेलडी लेन’ में लिखते हैं, “जैसे ही किशोर को इसके बारे में पता चला वो सलिल के म्यूज़िक रूम में गए और उनसे पूछा कि उन्हें अपनी ही फ़िल्म में क्यों नहीं गाने दिया जा रहा है?”

“सलिल का जवाब था, ‘मैंने तुम्हें पहले कभी गाते हुए नहीं सुना.’ परेशान किशोर ने कहा, ‘सलिल दा कम से कम अब तो आप मुझे गाते हुए सुन लीजिए.’ जैसे ही किशोर ने गाना शुरू किया, सलिल चौधरी ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘तुम्हें संगीत की एबीसी भी नहीं आती. तुम जा सकते हो. हेमंत कुमार तुम्हारे लिए गाना गाएंगे.’ परेशान किशोर कुमार फ़िल्म के प्रोड्यूसर बिमल रॉय के पास अपना केस ले कर गए.”

“उन्होंने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कहा, ‘संगीत सलिल चौधरी का डिपार्टमेंट है. मेरा संगीत निर्देशक तय करता है कि गाना कौन गाएगा.’ किशोर फिर अपने दो रिकॉर्ड लेकर सलिल चौधरी के पास गए लेकिन उन्होंने उनकी एक न सुनी और आख़िर में किशोर कुमार को हेमंत कुमार ने ही अपनी आवाज़ दी.”

सलिल चौधरी और मन्ना डे हुए किशोर कुमार के मुरीद

17 साल बाद 1971 में उन्हीं सलिल चौधरी ने गुलज़ार की फ़िल्म ‘मेरे अपने’ में किशोर कुमार से वो मशहूर गाना ‘कोई होता जिसको अपना हम कह लेते यारों’ गवाया.

बाद में सलिल ने खुद स्वीकार किया, “मैं खेमचंद को इस लड़के की चमक पहचानने के लिए सैल्यूट करता हूँ. मैं मानता हूँ कि हम सभी से किशोर की प्रतिभा पहचानने में गलती हुई थी.”

किशोर कुमार ने शास्त्रीय गायन की कभी कोई ट्रेनिंग नहीं ली.

लेकिन इसके बावजूद हिंदी सिनेमा में शास्त्रीय गायन के दिग्गज और साल 2005 में पद्म भूषण और साल 2007 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित मन्ना डे ने अपनी आत्मकथा ‘मेमरीज़ कम अलाइव: एन ऑटोबायोग्राफ़ी’ में स्वीकार किया था, “मुझे शास्त्रीय संगीत न जानने वाले किशोर कुमार के साथ गाने में घबराहट महसूस होती थी.”

“उनके गाने का एक ख़ास अंदाज़ था जो शास्त्रीय संगीत की बारीकियों पर भी भारी पड़ता था और युगल गाने में उनके साथ गा रहे साथी गायक को असुविधा में डाल देता था. जब मैंने फ़िल्म ‘अमीर ग़रीब’ में उनके साथ ‘मेरे प्याले में शराब डाल दे’ गाया तो मैंने इस बात को साफ़ साफ़ महसूस किया.”

देवानंद और राजेश खन्ना की आवाज़ बने किशोर कुमार

देवानंद ने शुरू में ही अपने लिए किशोर कुमार की आवाज़ को चुना. वो अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ़’ में लिखते हैं, “जब भी मुझे ज़रूरत होती कि किशोर मेरे लिए गाएं, वो रिकॉर्डिंग स्टूडियो में माइक्रोफ़ोन के सामने देवानंद का रोल निभाने के लिए तैयार रहते.”

“वो मुझसे हमेशा पूछते कि मैं इस गाने को स्क्रीन पर किस तरह गाऊंगा? फिर वो उसी के अनुसार अपने को ढाल कर गाना रिकॉर्ड करवाते. मैं उनसे हमेशा कहता कि आप इसको जितना लहक कर गा सकें, गाइए. मैं आपके गाने के मिज़ाज से अपने अभिनय को ढाल लूँगा.”

साल 1969 में ‘आराधना’ फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद किशोर राजेश खन्ना की भी आवाज़ बन गए.

किशोर कुमार की जीवनी लिखने वाले शशिकांत किनिकर लिखते हैं, “किशोर ने ‘आराधना’ के निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत से कहा कि वो गानों की रिकॉर्डिंग से पहले राजेश खन्ना से मिलना चाहेंगे.”

“जब वो राजेश खन्ना से मिले तो उन्होंने उनकी एक-एक भावभंगिमा का अध्ययन किया ताकि उनके चरित्र को गानों के ज़रिए हूबहू उतारा जा सके.”

“बाद में राजेश खन्ना ने माना कि इन गानों की शूटिंग के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि ये गाने किशोर कुमार नहीं बल्कि वो खुद गा रहे हों. इस फ़िल्म में गाए उनके दो गानों ‘मेरे सपनों की रानी’ और ‘रूप तेरा मस्ताना’ ने राजेश खन्ना और किशोर कुमार दोनों को नैशनल ‘रेज’ बना दिया.”

सचिनदेव बर्मन और किशोर कुमार की ट्यूनिंग

किशोर कुमार के गायन को सबसे अधिक निखारा सचिनदेव बर्मन के संगीत निर्देशन ने. उनके बेटे आरडी बर्मन ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था, “दादा रिकॉर्डिंग से तीन दिन पहले किशोर को अपनी धुन स्पूल टेप में भिजवा देते थे.”

“वह अपने स्टडी रूम में इन धुनों पर रियाज़ करते थे. किसी को भी उनके कमरे में जाने की अनुमति नहीं थी और रियाज़ के समय उनका कमरा अंदर से लॉक रहता था. किशोर उस धुन पर अभ्यास कर रिकॉर्डिंग स्टूडियो में घुसते थे.”

एक बार एसडी बर्मन को याद करते हुए किशोर कुमार ने भी कहा था, “एसडी बर्मन की एक अजीब आदत थी वो अपने गायकों को फ़ोन करते थे और उनकी आवाज़ सुन कर बिना बात किए फ़ोन रख देते थे.”

“ये उनका अपने गायक की गले की हालत परखने का अपना अंदाज़ हुआ करता था. एक दिन देर रात उन्होंने मुझे फ़ोन कर ‘कोरा काग़ज़ था ये मन मेरा’ की धुन सुनाई. हम दोनों जल्दी सो जाया करते थे और सुबह तड़के उठते थे.”

“उस दिन दादा ने मेरी आवाज़ सुनकर फ़ोन रखा नहीं बल्कि मुझे वो गाना गाने के लिए कहा. मुझे ज़ोरों की नींद आ रही थी. उन्हें गाना सुनाते समय भी मैं जम्हाइयाँ भर रहा था. लेकिन पूरी तरह संतुष्ट हो जाने के बाद ही उन्होंने मुझे दोबारा सोने की इजाज़त दे दी.”

किशोर कुमार की हरकतों से परेशान होती थीं लता मंगेशकर

एक बार लता मंगेशकर से पूछा गया था कि आपको किसके साथ डुएट गाने में सबसे अधिक मज़ा आया तो उन्होंने किशोर कुमार का नाम लिया था. लेकिन उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि उन्हें किशोर के साथ डुएट गाने में बहुत दिक्कत भी होती थी.

लता का कहना था कि “गाते समय उनके संगीत और गायन को लेकर कोई समस्या नहीं होती थी, मगर जिस तरह वो हँसाते हँसाते पेट में दर्द करा देते थे, उसको सँभालना मुश्किल होता था. आप कितना भी सीरियस क्यों न हों, जब आप अंतरों में तान ले रहे हों या हरकत दिखा रहे हों, किशोर दा कोई ऐसा बेवकूफ़ी भरा इशारा करते थे, जिससे आपका ध्यान गाने से हट जाए.”

“कई बार हम लोग गाने को बीच में रुकवा कर उनसे मिन्नतें करते थे कि दादा पहले शांति से गाना रिकॉर्ड करवा दो, फिर ये सब कर लेना. दिलचस्प बात ये थी कि वो कितना भी उछलकूद और हँसोड़ हरकतें क्यों न कर रहे हों, खुद उन सब से बाहर रह कर गंभीर मुद्रा में गाते थे.”

अदृश्य लड़के से बातचीत

फ़िल्म गायन से जुड़े हर व्यक्ति के पास किशोर कुमार से जुड़े अनेकों क़िस्से हैं. आशा भोंसले बताती हैं, “किशोर दा अक्सर एक ऐसे लड़के के साथ रिकॉर्डिंग करवाने आते थे जो दिखाई नहीं देता था.”

“वो उससे लगातार बातें करते, चुटकले सुनाते और ज़ोर का ठहाका लगाते. कभी-कभी वो मुझे भी उन दोनों की बातचीत में शामिल होने का न्योता देते. मुझे ये थोड़ा अजीब ज़रूर लगता लेकिन हम लोगों का ज़बरदस्त मनोरंजन हुआ करता.”

इसी तरह की एक कहानी आरडी बर्मन सुनाया करते, “मैंने किशोर कुमार को बॉम्बे टॉकीज़ के दफ़्तर में देखा ज़रूर था लेकिन उनसे पहली बार 1952 में मिला. एक दिन मेरे पिता मुझे कारदार स्टूडियो ले गए जहाँ उनके गाने की रिकॉर्डिंग चल रही थी.”

“जब हम मेन गेट में घुसे तो मैंने देखा कि कुर्ता पायजामा पहने और गले में मफ़लर डाले एक शख़्स बाउंड्री वॉल पर बैठा हुआ है. मेरे पिता ने मुझसे कहा कि ये शख़्स मुझे बहुत तंग करता है. ये कहते हुए वो स्टूडियो के अंदर चले गए.”

“मैं किशोर कुमार के पास रुक गया और उनसे पूछा कि आप यहाँ क्या कर रहे हैं? उनका तुरंत जवाब था, ‘मैं कारदार साहब की नकल कर रहा हूँ.’ जब मैंने उनका नाम पूछा तो उन्होंने ज़ोरों से अपना पैर हिलाते हुए दवाब दिया, ‘किशोर कुमार खंडवावाला.’ इस बीच उनका एक जूता नीचे गिर गया.”

“मैंने वो जूता उन्हें उठा कर दे दिया. मैंने उनसे पूछा कहीं आप अशोक कुमार के भाई तो नहीं हैं, उनका जवाब था- हाँ और इसीलिए मुझे कोई काम नहीं देता. फिर वो अशोक कुमार और मेरे पिता की नकल करने लगे. उन्हें देख कर हँसते हँसते मेरे पेट में बल पड़ गए.”

बढ़िया खा ले करारे गजक’

किशोर कुमार के जीवनीकार डेरेक बोस अपनी किताब ‘किशोर कुमार मेथड इन मैडनेस’ में उनसे जुड़े कुछ और क़िस्से सुनाते हैं.

“वो अपने गार्डेन में पेड़ों से बाते किया करते थे. उन्होंने उनको बाकायदा नाम दे रखे थे जनार्दन, रघुनंदन, बुद्धू राम, गंगाधर वगैरह वगैरह. उन्होंने अपने घर के पिछवाड़े झूले लगवा रखे थे और वो उनमें बच्चों की तरह झूला करते थे.

अमित खन्ना ने एक बार रविवार की दोपहर किशोर कुमार को बैट्री से चलने वाले खिलौनों के बीच बैठे हुए देखा, जिन्हें उन्होंने एक साथ स्विच ऑन कर रखा था. जब भी वो अपने किसी नज़दीकी से मिलते थे तो उनका पहला वाक्य होता था, ‘बढ़िया खाले करारे गजक’, चाहे इसका जो भी मतलब कोई निकाले.”

‘कुत्ता बन कर’ ओपी रल्हन का हाथ काटा

ओपी रल्हन भी एक क़िस्सा सुनाया करते थे कि किस तरह साल 1959 में ‘शरारत’ की शूटिंग के दौरान किशोर कुमार ने उन्हें क़रीब-क़रीब पागल ही कर दिया था.

“एक दिन किशोर सेट पर शूटिंग के लिए नहीं पहुंचे. परेशान हो मैंने उनके घर जाकर उनको अपने साथ लाने का फ़ैसला किया. जब मैं उनके घर पहुंचा तो वो वहाँ मौजूद तो थे लेकिन उन्होंने कुत्तों की तरह अपने गले में एक पट्टा बाँध रखा था.”

“उनके सामने एक प्लेट रखी हुई थी जिसमें एक चपाती रखी हुई थी. उसके बगल में पानी का एक कटोरा भी था. वहीं एक बोर्ड भी रखा हुआ था जिसपर लिखा था ‘कुत्ते को डिस्टर्ब मत करो.’ जब मैंने उनसे शूटिंग पर चलने के लिए कहा तो वो कुत्ते की तरह गुर्राने लगे.”

“जब मैंने जिस तरह कुत्ते के सिर पर हाथ रखते हैं, उनके सिर पर भी हाथ रखने की कोशिश की तो उन्होंने मेरे हाथ में काट खाया. फिर वो कुत्ते की तरह तब तक भौंकते रहे जब तक उन्होंने मुझे गेट से बाहर नहीं कर दिया.”

किशोर के दोस्तों और नज़दीकी लोगों का कहना था कि वो इस तरह का व्यवहार उन लोगों के साथ करते थे जिनसे वो मिलना नहीं चाहते थे, ख़ासतौर से उन लोगों से जो उनके पैसे उन्हें नहीं दे रहे थे.

सत्यजीत राय को दिए थे 5000 रुपये

किशोर कुमार के बारे में मशहूर था कि वो अपने पैसों को बहुत सँभाल कर रखते थे.

लेकिन गीतकार समीर बताते हैं कि “उन्होंने उनके पिता अंजान के लिए बिना कोई पैसा लिए कम से कम 10 गीत गाए थे. मुझे याद है कई बार उन्होंने मेरे पिता को अपनी कार से घर छोड़ा था, जब हमारे पास कार खरीदने के पैसे नहीं होते थे.”

“जब उन्होंने ‘चलती का नाम गाड़ी बनाई’ थी तो उन्होंने मेरे पिता से उसके गीत लिखने के लिए कहा था और मार्केट रेट से कहीं ज़्यादा पैसे उन्हें दिए थे.”

मशहूर फ़िल्म निर्देशक सत्यजीत राय जब ‘पथेर पांचाली’ बना रहे थे तो किशोर कुमार ने उन्हें 5000 रुपये देकर उनकी मदद की थी. उन्होंने राय की फ़िल्म ‘चारुलता’ के लिए भी दो गीत गाए थे और उसके लिए कोई पारिश्रमिक नहीं लिया था.

किशोर कुमार के गानों पर प्रतिबंध

साल 1975 में इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी ने बंबई के मशहूर फ़िल्मकारों को म्यूज़िकल नाइट में भाग लेने के लिए दिल्ली आमंत्रित किया था.

कई आमंत्रित लोग दिल्ली गए थे लेकिन किशोर कुमार ने न सिर्फ़ इस आमंत्रण को ठुकरा दिया था बल्कि ये स्पष्टीकरण भी नहीं दिया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया था.

शशिकांत किनिकर किशोर कुमार की जीवनी में लिखते हैं, “संजय गांधी ने इसे अपना निजी अपमान माना था और सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल को बुला कर कहा था कि किशोर के गाने किसी भी सरकारी संचार माध्यम में नहीं बजाए जाएं.”

“नतीजा ये हुआ कि ऑल इंडिया रेडियो पर किशोर कुमार के गाने बजने बंद हो गए. इसके अलावा जिन फ़िल्मों में किशोर कुमार ने गाने गाए थे, उन्हें सेंसर ने सर्टिफ़िकेट देने से इनकार कर दिया.”

आठ फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीते

किशोर कुमार को कुल 27 बार फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ गायक के पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. उसमें से 8 बार उन्होंने ये पुरस्कार जीता.

शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग न होते हुए भी जिस तरह उन्होंने राग शिवरंजनी में ‘मेरे नैना सावन भादों’ को गाया और 1981 में राग यमन में जिस बारीकी से ‘छू कर मेरे मन को’ गाने को आवाज़ दी, उसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती है.

किशोर कुमार के फ़िल्मी जीवन के संगीत सफ़र का साल 1977 में आई फ़िल्म ‘अनुरोध’ के इस गाने से रेखांकित किया जा सकता है.

आप के अनुरोध पर

मैं ये गीत सुनाता हूँ

अपने दिल की बातों से

आपका दिल बहलाता हूँ

आपके अनुरोध पर….

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