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क्या है क्वाड ? क्यों है चीन इससे परेशान ?

“हम सभी जानते हैं कि क्वाड किस तरह का तंत्र है. एक अलग गुट बनाने, चीन को एक चुनौती के रूप में पेश करने, क्षेत्र के देशों और चीन के बीच कलह पैदा करने के कुछ देशों के प्रयासों का चीन विरोध करता है.”

यह टिप्पणी 12 मई को चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में की. एक अन्य प्रश्न के जवाब में चुनयिंग ने कहा, “जहां तक क्वाड का संबंध है, मुझे लगता है कि भारत इस तंत्र की मंशा को हमसे बेहतर जानता है. क्या इसका इरादा चीन के खिलाफ एक छोटे-से गुट को खड़ा करना नहीं है?”

कुछ ही दिन पहले ढाका में चीन के राजदूत ली जिमिंग ने बांग्लादेश को अमेरिका के नेतृत्व वाले क्वाड गठबंधन में शामिल होने के खिलाफ आगाह करते हुए कहा था कि बीजिंग विरोधी “क्लब” में ढाका की भागीदारी के वजह से दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को “काफी नुक़सान” होगा.

बांग्लादेश के डिप्लोमैटिक कॉरेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन की तरफ से आयोजित एक वर्चुअल बैठक में ली ने कहा था, “जाहिर है, बांग्लादेश के लिए चार देशों के इस छोटे से क्लब (क्वाड) में भाग लेना अच्छा नहीं होगा क्योंकि यह हमारे द्विपक्षीय संबंधों को काफी नुकसान पहुँचाएगा.”

चीनी राजदूत की टिप्पणी को “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण” और “आक्रामक” बताते हुए बांग्लादेश के विदेश मंत्री डॉ एके अब्दुल मोमेन ने कहा था, “हम एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य हैं. हम अपनी विदेश नीति खुद तय करते हैं.”

क्या है क्वाड?

क्वाड शब्द “क्वाड्रीलेटरल सुरक्षा वार्ता” के क्वाड्रीलेटरल (चतुर्भुज) से लिया गया है. इस समूह में भारत के साथ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं. क्वाड जैसे समूह को बनाने की बात पहली बार 2004 की सुनामी के बाद हुई थी जब भारत ने अपने और अन्य प्रभावित पड़ोसी देशों के लिए बचाव और राहत के प्रयास किए और इसमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान भी शामिल हो गए थे.

लेकिन इस आइडिया का श्रेय जापान के पूर्व प्रधान मंत्री शिंज़ो आबे को दिया जाता है. 2006 और 2007 के बीच आबे क्वाड की नींव रखने में कामयाब हुए और चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता की पहली अनौपचारिक बैठक वरिष्ठ अधिकारीयों के स्तर पर अगस्त 2007 में मनीला में आयोजित की गई.

उसी साल क्वाड के चार देशों और सिंगापुर ने मालाबार के नाम से बंगाल की खाड़ी में एक नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लिया था. इस सब पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए क्वाड देशों से यह बताने को कहा था कि क्या क्वाड एक बीजिंग विरोधी गठबंधन है? क्वाड को एक झटका और लगा जब कुछ समय बाद ही ऑस्ट्रेलिया इससे अलग हो गया.

दस साल बाद 2017 में मनीला में आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान ‘भारत-ऑस्ट्रेलिया-जापान-अमेरिका’ संवाद के साथ क्वाड वापस अस्तित्व में आया.

यह बैठक इन देशों के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के मनीला पहुँचने से कुछ घंटे पहले हुई. यह वार्ता इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण थी कि उस समय भारत और चीन के बीच डोकलाम में गतिरोध चल रहा था.

2017 में गति मिलने के बाद क्वाड के विदेश मंत्री अक्टूबर 2020 में टोक्यो में मिले और कुछ ही महीनों बाद इस साल मार्च में जो बाइडेन के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के कुछ ही हफ़्तों बाद अमेरिका ने क्वाड के वर्चुअल शिखर सम्मलेन की मेज़बानी की.

क्या है चीन की दिक़्क़त?

चीन शुरू से ही क्वाड को चार विरोधी देशों का समूह मानता रहा है. उसे लगता है कि क्वाड के ये चार देश उसकी बढ़ती ताकत के खिलाफ गुटबंदी कर रहे हैं.

क्वाड के देशों ने सैन्य क्षेत्र को लेकर कोई सार्वजानिक बयान नहीं दिए हैं पर ये माना जाता है कि दक्षिण चीन सागर और हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश लगाना इन देशों की एक बड़ी प्राथमिकता है.

रक्षा विशेषज्ञ सी उदय भास्कर भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त कमोडोर हैं. वे आजकल दिल्ली स्थित सोसाइटी फॉर पालिसी स्टडीज़ के निदेशक हैं.

उनके अनुसार चीन क्वाड के ग्रुप को लेकर काफी चिंतित है. वे कहते हैं, “पिछले साल चीन इसे नीचा दिखाने की कोशिश कर चुका है. उनके एक मंत्री ने कहा था कि क्वाड समुद्र के पानी पर झाग जैसा है जो हवा से उड़ जायेगा. क्वाड चीन के लिए हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में बहुत बड़ी चुनौती हो सकता है, इसीलिए क्वाड की क्षमता देखते हुए चीन बहुत चिंतित है.”

भास्कर का यह भी मानना है कि कुछ दिन पहले ढाका में चीन के राजदूत ने शेख हसीना सरकार को दी गई चेतावनी अजीब थी “क्योंकि बांग्लादेश की तरफ से क्वाड में शामिल होने की या उससे कोई सम्बन्ध रखने की कोई पहल नहीं की जा रही थी. इससे यही समझ आता है कि चीन क्वाड के बारे में बहुत चिंतित है”.

उनका यह भी कहना है कि “समुद्री क्षेत्र में चीन अपना दबदबा दक्षिण चीन सागर में और पूर्व सागर मे दिखाता रहा है”. उनके अनुसार इस दबदबे की वजह से जहाँ दक्षिण चीन सागर में आसियान के देश प्रभावित हुए हैं, वहीं पूर्व सागर में जापान.

वे कहतें हैं, “दोनों क्षेत्रों में चीन एक चुपके-चुपके अपना दावा बढ़ाता दिख रहा है. दक्षिण चीन सागर में नाइन डैश लाइन और कृत्रिम इंस्टालेशन बना दिए हैं और तरह-तरह के क्षेत्रीय दावे कर दिए हैं. यह सब देखते हुए जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका ने कहा है कि समुद्री क्षेत्र में एक नियम आधारित व्यवस्था होनी चाहिए.”

पिछले साल नवंबर में भारतीय नौसेना ने बहुपक्षीय युद्धाभ्यास ‘मालाबार’ का आयोजन हिंद महासागर में किया. इस अभ्यास में अमेरिकी नौसेना, जापानी मैरीटाइम सेल्फ़ डिफेंस फ़ोर्स और रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी ने हिस्सा लिया. क्वाड देशों के इस युद्धाभ्यास को चीन के लिए एक संदेश की तरह देखा गया.

कमोडोर भास्कर के अनुसार समुद्री क्षेत्र के अलावा चीन के साथ साइबर और स्पेस के क्षेत्रों में भी नियम आधारित व्यवस्था बनाने की कोशिश होनी चाहिए. वे कहते हैं, “चीन को नियम आधारित व्यवस्था में लाने के लिए लोकतान्त्रिक देश अपना एक गुट बनाते हुए सिद्धांतों के लिए आगे बढ़ सकते हैं.”

उनका यह भी मानना है कि अगर यह चार देश मिलकर सहमति बना रहे हैं तो “यह चीन के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि एक नियम आधारित व्यवस्था बनाने के लिए है”.

वे कहते हैं, “क्वाड ग़ैर-सैनिक मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है जिसमें कोविड महामारी के दौरान एक दूसरे से सहयोग करना और ज़रूरतमंद देशों की मदद करने की बात की गई है.”

चीन पर दबाव की रणनीति?

पिछले साल जब भारत पूरे विश्व की तरह कोरोना महामारी की पहली लहर से जूझ रहा था, उसी दौरान चीन की ओर से लद्दाख क्षेत्र के कई सीमा क्षेत्रों में घुसपैठ करने की खबरें आनी शुरु हुईं. कुछ ही महीनों में यह स्पष्ट हो गया कि चीन की सेना ने भारत के साथ सीमा पर सैकड़ों वर्ग किलोमीटर पर कब्ज़ा कर लिया था और सशस्त्र ठिकाने बना लिए थे. इसके कारण दोनों देशों के सैनिकों में झड़पें भी हुई.

तो क्या चीन के साथ संबंधों में आई खटास ने भारत को अमेरिका और क्वाड की तरफ धकेलने में भूमिका निभाई?

उदय भास्कर कहते हैं कि जो लदाख में हुआ उसका क्वाड से इतना सीधा संबंध तो नहीं है. वे कहते हैं, “ये सोचना ग़लतफहमी है कि अगर भारत हिन्द महासागर के समुद्री क्षेत्र में पूरा दबाव डालेगा तो चीन की लद्दाख की गतिविधियों पर कोई फर्क पड़ेगा. मैं नहीं समझता कि इतना सीधा संबंध है.”

पर कोमोडोर भास्कर यह ज़रूर मानते हैं कि जो बाइडेन के आने के बाद क्वाड की गतिविधियां बढ़ गई हैं. वे कहते हैं, “भारत अभी भी यही कहता है कि क्वाड चीन विरोधी नहीं है. क्वाड में सिद्धांतों के लिए सहमति बन रही है तो समझने वाले समझ जाएँगे कि इसका एक दूसरा पहलु भी है. भारत के पास जो समुद्री क्षेत्र में शक्ति है उसके कारण उसे अन्य देशों के साथ मिलकर चलना ही चाहिए.”

नेटो से तुलना

चीन और वहां का मीडिया समय-समय पर क्वाड को एशियाई नेटो के नाम से पुकारता रहा है.

अप्रैल में भारत की यात्रा पर आए रुसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने यह संकेत दिया कि रूस इन अटकलों से अवगत था कि क्वाड एशिया के नेटो में परिवर्तित हो रहा है. रूस ने भारत को हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन को नियंत्रित करने के लिए क्वाड को नाटो जैसे सैन्य गठबंधन में बदलने के लिए अमेरिका के किसी भी कदम से दूर रहने के लिए भी कहा था.

भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने उस समय कहा था कि उन्होंने हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के बारे में रुसी विदेश मंत्री से भारत का दृष्टिकोण साझा किया था और यह भी बताया था कि समसामयिक चुनौतियों से निपटने के लिए देशों को नए और अलग तरीकों से एक साथ काम करने की आवश्यकता है.

उदय भास्कर के अनुसार आज के समय में चीन के खिलाफ नेटो जैसा गठबंधन बनाना संभव नहीं है. वे कहते हैं, “नेटो जब बना था तब विश्व का सामरिक ढांचा और सन्दर्भ बिलकुल अलग था. शीत युद्ध में एक तरफ अमेरिका की अगुवाई में पश्चिमी और यूरोपीय देश शामिल थे और दूसरी ओर भूतपूर्व सोवियत संघ और उनके सहयोगी देश थे. सबसे बड़ी बात यह थी कि दोनों पक्षों–अमेरिका और सोवियत संघ– के बीच में किसी तरह का व्यापर नहीं होता था.”

भास्कर कहते हैं कि स्थिति आज बदल चुकी है. वे कहते हैं, “आज वैश्वीकरण की वजह से आर्थिक और व्यापार की परस्पर निर्भरता बहुत ही बढ़ गई है. इस वजह से क्वाड के जितने भी देश हैं, चाहे वो अमेरिका हो या भारत या जापान या ऑस्ट्रेलिया, चीन के साथ उनका व्यापार और निवेश परस्पर है. तो अगर क्वाड को नेटो जैसा बनाना है, तो यह व्यापार की निर्भरता हटानी होगी, जो निकट भविष्य होता नहीं दिखता है.”

क्वाड के विरोधाभास

जहाँ एक ओर क्वाड में शामिल देश वैक्सीन साझेदारी, क्लाइमेट चेंज और नई तकनीकों पर एकजुट हो काम करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता जता चुके हैं वहीं समय-समय पर इस समूह में कुछ विरोधाभास भी नज़र आए हैं.

जैसे अप्रैल में एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में अमेरिका के सामुद्री जहाज़ जॉन पॉल जोन्स ने लक्षद्वीप समूह के लगभग 130 समुद्री मील पश्चिम में भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में अपने नौवहन अधिकारों और स्वतंत्रता का दावा किया, यह कार्रवाई भारत से बिना अनुमति माँगे की गई थी.

एक आधिकारिक बयान में अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े ने कहा कि “इस फ्रीडम ऑफ नॅविगेशन ऑपरेशन ने भारत के अत्यधिक समुद्री दावों को चुनौती देकर अंतर्राष्ट्रीय कानून में मान्यता प्राप्त समुद्र के अधिकारों, स्वतंत्रता, और वैध उपयोगों को बरकरार रखा.”

क्वाड जैसे समूह का हिस्सा होने पर भी अमेरिका का भारत के साथ इस भाषा में बात करना क्या दिखाता है. उदय भास्कर मानते हैं कि इसमें “इसमें हल्का सा विरोधाभास है”.

वे कहते हैं, “जिस तरह अमेरिका ने मालदीव और भारत के बारे में कहा, उससे लगा कि हलकी-सी गाँठ है लेकिन अगर इसे बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें, तो मैं कहूंगा कि बाइडेन के नेतृत्व में जिस तरह अमेरिका ने अपना नक्शा बनाया है उसके अनुसार क्वाड अभी केवल आलाप में है, उसने अभी अपना राग नहीं पकड़ा है.”

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