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क्या उच्च न्यालय भी करता रहा है महिलाओं के साथ भेदभाव

भारत के मुख्य न्यायाधीश शरद बोबडे ने उच्च न्यायालय में एडहॉक न्यायाधीशों के नियुक्ति संबंधी याचिका की सुनवाई के दौरान कहा था, “समय आ गया है जब भारत में कोई महिला मुख्य न्यायाधीश बने.”

शरद बोबडे भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश हैं. उनसे पहले 46 मुख्य न्यायाधीश हुए हैं और सभी के सभी पुरुष ही थे. बोबडे के बाद एक और पुरुष एनवी रमन्ना भारत के 48वें मुख्य न्यायाधीश होंगे.

अपने ऑब्जर्वेशन में जस्टिस बोबडे ने कहा था, “हमें ध्यान है कि न्याय व्यवस्था में महिलाओं की ज़रूरत है. हम इसे अच्छी तरह लागू कर रहे हैं. हमारे नज़रिए में कोई बदलाव नहीं आया है, हमें केवल अच्छे लोग चाहिए.”

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट की महिला वकीलों की एसोसिएशन ने उच्च न्यायिक व्यवस्था में महिला न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की मांग के साथ दाख़िल किया था. एसोसिएशन ने अदालत को यह भी बताया था कि देश के सर्वोच्च न्यायालय सहित उच्च न्यायालयों में मौजूद न्यायाधीशों में महज 11 प्रतिशत महिलाएँ हैं.

याचिकाकर्ताओं में शामिल स्नेह खालिता ने बीबीसी को बताया, “भारत की उच्च न्यायिक व्यवस्था में इतनी कम महिला न्यायाधीशों की मौजूदगी दुखद है. हमलोगों ने इससे पहले भी इसको लेकर आवाज़ उठाई है. मैंने इसे 2015 में संवैधानिक बेंच के पास भी इसे उठाया था. बेंच ने उच्च न्यायिक व्यवस्था में महिलाओं की संख्या बढ़ाने का सुझाव दिया था. आपको विश्वास नहीं होगा, जो आँकड़े मैंने तब दिए थे, उससे एक भी महिला नहीं बढ़ सकी है.”

सुप्रीम कोर्ट-हाई कोर्ट में महिला न्यायाधीशों की संख्या

भारत में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना 1950 में हुई थी. यह 1935 में बनाए गए फ़ेडरेल कोर्ट की जगह स्थापित हुआ था. इसके बाद से अब तक 47 मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति हो चुकी है.

शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित आठ न्यायाधीशों की व्यवस्था थी. हालाँकि संविधान ने भारतीय संसद को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का अधिकार दिया हुआ था.

जब सुप्रीम कोर्ट में मामले की संख्या बढ़ने लगी, तो 1956 में इसे आठ से बढ़ाकर 11 किया गया. इसके बाद 1960 में इसे 14 किया गया. 1978 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 18 हुई है, जिसे 1986 में 26 किया गया. 2009 में इनकी संख्या 31 की गई और 2019 में सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित 34 न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई.

अब तक केवल आठ महिलाओं को भारतीय की सर्वोच्च अदालत में न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त किया गया. 1989 में जस्टिस फ़ातिमा बीवी सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं.

मौजूदा समय में सुप्रीम कोर्ट के 34 न्यायाधीशों में इंदिरा बनर्जी अकेली महिला हैं. देश भर के 25 उच्च न्यायालयों में केवल एक में मुख्य न्यायाधीश के तौर पर महिला न्यायाधीश हैं.

तेलंगाना हाईकोर्ट की न्यायाधीश हिमा कोहली हैं. इन उच्च न्यायालयों में कुल 661 न्यायाधीश हैं और इनमें 73 महिलाएँ हैं. मणिपुर, मेघालय, बिहार, त्रिपुरा और उत्तराखंड की उच्च न्यायालयों में कोई महिला न्यायाधीश नहीं हैं.

न्यायिक व्यवस्था में इतनी कम महिला न्यायाधीश क्यों हैं?

मैंने याचिका दाख़िल करने वालों से यह जानना चाहा कि आख़िर किस बात ने उन्हें याचिका दाख़िल करने के लिए प्रेरित किया. इस बारे में याचिकाकर्ताओं में शामिल शोभा गुप्ता ने बताया, “यह मुद्दा उठाने में काफ़ी देरी हो चुकी है. सबसे पहले तो मेरा यही मानना है कि आबादी में पुरुष और महिलाओं का अनुपात क़रीब 50-50 प्रतिशत है. यह हमारी उच्च न्यायिक व्यवस्था में भी दिखना चाहिए. लैंगिक स्तर पर समानता होनी चाहिए. पहले भी मुद्दा उठाया गया है और इस बार भी हमलोग उठा रहे हैं कि न्यायिक व्यवस्था में ज़्यादा से ज़्य़ादा महिलाएँ होनी चाहिए.”

रिटायर्ड जस्टिस सुजाता मनोहर पहले केरल हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश रहीं और बाद में सुप्रीम कोर्ट में भी न्यायाधीश रही हैं. उनके मुताबिक समस्या की जड़ काफ़ी गहरे तक है.

उन्होंने कहा, “यह एक दुष्चक्र जैसी स्थिति है. पहले तो हमारे पास बड़ी संख्या में प्रैक्टिस करने वाली अच्छी महिला वकील नहीं है. यह हाई कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए ज़रूरी है. हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति ही सुप्रीम कोर्ट में होती है. ऐसे में अगर हमारे पास उच्च न्यायालय में अच्छी महिला न्यायाधीश ही नहीं होंगी, सुप्रीम कोर्ट में उनका प्रतिनिधित्व बेहतर नहीं हो सकता है.”

जस्टिस मनोहर का यह भी कहना है कि महिला वकीलों का उत्साह उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की बेंचों में कम महिला न्यायाधीशों को देखकर भी कम होता है. वह कहती हैं कि हमें इस दुष्चक्र को तोड़ना होगा. उन्होंने कहा, “हमारे पास कुछ बेहतरीन वकील हैं, जो हाई कोर्ट में न्यायाधीश बनने की पात्रता रखती हैं.”

लेकिन शोभा गुप्ता सवाल करती हैं कि ऐसा है, तो स्थिति क्यों नहीं बदल रही है.

शोभा गुप्ता ने कहा, “हाँ ये सही है कि पहले इतनी बड़ी संख्या में महिला वकील नहीं थीं. जब मैंने वकालत शुरू की थी, तब महिला वकील अपवाद के रूप में दिखती थीं. 1997 में सुप्रीम कोर्ट में 130 महिला वकील प्रैक्टिस कर रही थीं. लेकिन अब राज्यों में भी बड़ी संख्या में महिला वकील प्रैक्टिस कर रही हैं. लेकिन इसके बाद भी उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों की संख्या नहीं बढ़ी है.”

भारत के मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने इस याचिका की सुनवाई के दौरान ये भी कहा था कि हमारे नज़रिए में कोई बदलाव नहीं आया है. ज़ाहिर है वे यह कह रहे थे कि वे चाहते हैं कि उच्च न्यायालयों में ज़्यादा से ज़्यादा महिला न्यायाधीश हों. लेकिन शोभा गुप्ता मानती हैं कि यह पर्याप्त नहीं है. वह नज़रिए में बदलाव पर ज़ोर देती हैं.

शोभा गुप्ता कहती हैं, “यह ब्यूटी कांटेस्ट जैसा है. हर कोई बहुत अच्छी-अच्छी बातें करता है. हर कोई यह जानता है कि क्या कहना सही होगा. लेकिन जब उसे लागू करने की स्थिति आती है तो वे नाकाम हो जाते हैं. मैं आपको उदाहरण देती हूँ, जस्टिस मुकुंदाकम शर्मा, जस्टिस संजय किशन कौल और दूसरे तमाम न्यायाधीशों ने कहा है कि उच्च न्यायालयों में सक्षम महिला वकील प्रैक्टिस कर रही हैं. एक के बाद दूसरे न्यायाधीश कह रहे हैं कि सक्षम महिला वकील प्रैक्टिस कर रही हैं, तो फिर उनकी न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति क्यों नहीं हो रही है, उन्हें इस लायक क्यों नहीं समझा जा रहा है?”

शोभा गुप्ता न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया के बारे में भी कहती हैं, “मैं यह तथ्य भी जानती हूँ कि जब उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए 20 नाम भेजे जाते हैं, तो उसमें मुश्किल से एक या दो महिलाएँ होती हैं. अच्छा तो यह होता कि उस सूची में चार महिलाएँ हों. पुरुषों और महिलाओं के बीच इतना ज़्यादा गैप है. इसके चलते उच्च न्यायिक व्यवस्था में कम महिला न्यायाधीश मौजूद हैं.”

क्या घरेलू ज़िम्मेदारियों के चलते महिलाएँ न्यायाधीश नहीं बनना चाहतीं?

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोबडे के एक कमेंट पर लोगों में ग़ुस्सा भी दिखता है. उन्होंने कहा था, “उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि कई महिलाओं को न्यायाधीश बनने का ऑफ़र दिया गया. लेकिन महिलाओं ने उस ऑफ़र को ठुकराया है. सभी ने घरेलू ज़िम्मेदारियों के नाम पर इनकार किया है, जैसे कि बच्चा 12वीं पढ़ रहा है. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने मुझे इस बारे में रिपोर्ट किया है. ये वे बाते हैं, जिस पर हमलोग चर्चा नहीं कर सकते. लेकिन हर कॉलेजियम महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सोचता है.”

लेकिन सवाल यह है क्या महिलाएँ वास्तविकता में घरेलू ज़िम्मेदारियों के नाम पर न्यायाधीश बनने का ऑफ़र ठुकरा देती हैं?

जस्टिस मनोहर इस बारे में बताती हैं, “मुझे आजतक एक भी ऐसी महिला वकील नहीं मिली हैं, जिन्होंने घरेलू ज़िम्मेदारियों के चलते उच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनने का ऑफ़र ठुकराया हो. मैं यह नहीं कह रहीं हूँ कि मुख्य न्यायाधीश ने जो कहा वो ग़लत है, हो सकता है उन्हें ऐसी महिला वकील मिली हों.”

वहीं दूसरी ओर, शोभा कहती हैं कि व्यक्तिगत वजहों से तो पुरुष भी ऐसे ऑफ़र ठुकराते रहे हैं.

उन्होंने बताया, “हम ऐसी कहानियाँ सुनते रहते हैं कि उस वकील ने न्यायाधीश बनने से इनकार कर दिया है, इस वकील ने न्यायाधीश बनने से इनकार किया है. वास्तव में, ऐसी कहानियाँ पुरुष वकीलों के बारे में होती हैं. उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में सभी न्यायाधीश पुरुष हैं. ऐसे में समस्या तब शुरू होती है, जब आप कॉलेजियम के पास 20 लोगों की सूची में केवल दो महिला वकील को रेफ़र करते हैं. अगर उनमें से एक निजी वजहों से ऑफ़र ठुकरा दे, तो आप कहेंगे कि महिलाएँ ऑफ़र ठुकरा रही हैं. आप 10 महिला वकीलों को रेफ़र करने से शुरुआत क्यों नहीं करते?”

शोभा गुप्ता के मुताबिक़ महिलाओं के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई जा रही है. उन्होंने कहा, “अगर यह 1950 का दशक होता, तब ठीक था लेकिन आज के दौर में महिलाओं को केवल औपचारिकता के लिए रेफ़र करना, एक समाज के तौर हमें नाकाम बनाता है.”

न्यायिक व्यवस्था में महिलाओं का इतिहास

दूसरे तमाम क्षेत्रों की तरह ही न्यायिक व्यवस्था में भी महिलाएँ जगह बनाने की कोशिशों में जुटी हैं. शोभा गुप्ता के मुताबिक़ लोग आज भी पेशे को जेंडर से अलग करके नहीं देख पाते हैं. ऐतिहासिक तौर पर भी महिलाओं के लिए इस क्षेत्र में जगह बनाना मुश्किल रहा है.

स्नेहा बताती हैं, “वकालत करने और न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए महिलाओं को संघर्ष करना पड़ा था. पहले हमें वकालत करने की अनुमति नहीं थी, हम किसी दूसरे के पक्ष में दलील नहीं रख सकते थे और तो हमें क़ानूनी पेशे में आने नहीं दिया जाता था. यह सब 1923 में बने क़ानून के बाद बदला. महिलाओं ने इसके लिए संघर्ष किया था.”

1923 में लीगल प्रैक्टिशनर (वीमेन) एक्ट के ज़रिए महिलाओं को वकालत करने की अनुमति दी गई. इससे पहले वकालत के पेशे को केवल पुरुषों का पेशा माना जाता था. रेगिना गुहा, सुधांशु बाला हाज़रा और कॉर्नेलिया सोराबजी नाम की तीन महिलाओं ने इसे चुनौती दी थी.

रेगिना गुहा ने अपनी क़ानूनी शिक्षा पूरी करने के बाद 1916 में याचिकाकर्ता के तौर पर नामांकन के लिए आवेदन दिया. यह उस वक़्त अपने आप में अनोखा मामला था. उनके आवेदन को कोलकाता हाईकोर्ट भेजा गया. बाद में इस मामले को ‘फर्स्ट पर्सन केस’ के तौर पर जाना गया.

लीगल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 1879 के तहत महिलाएँ याचिकाकर्ता नहीं हो सकती थीं और इस तरह से महिलाएँ पूरी तरह से इस पेशे से बाहर थीं. गुहा की याचिका को पाँच जजों की बेंच ने सुना और सर्वसम्मति से ख़ारिज कर दिया.

1921 में सुधांशु बाला हाज़रा ने रेगिना गुहा की तरह ही कोशिश की. उन्होंने पटना हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता होने के लिए आवेदन दिया. इसे ‘सेकेंड पर्सन केस’ के तौर पर जाना जाता है.

हालाँकि इससे पहले ब्रिटेन की अदालत ने सेक्स डिस्क्वालिफिकेशन रिमूवल एक्ट, 1919 को पारित कर दिया था, जिसके चलते क़ानूनी पेशे में महिलाओं के आने का रास्ता खुल गया था.

सुधांशु बाला हाज़रा के मामले में पटना हाई कोर्ट की बेंच ने महिलाओं के वकालत करने के पक्ष में विचार रखे, लेकिन कोलकाता हाई कोर्ट के फ़ैसले को नज़ीर मानते हुए हाज़रा का आवेदन रद्द कर दिया.

इसी साल, कोर्नेलिया सोराबजी ने इलाहाबाद में याचिकाकर्ता के रूप में नामांकन के लिए याचिका दाख़िल किया और फ़ैसला उनके पक्ष में आया. इस तरह से वे भारत की पहली महिला वकील बनीं.

इसके बाद लीगल प्रैक्टिशनर्स (वीमेन) एक्ट, 1923 में लागू हुआ और इस क़ानून ने कलकत्ता हाई कोर्ट और पटना हाई कोर्ट के फ़ैसले को निरस्त कर दिया. इस क़ानून ने लैंगिक आधार पर वकालत में होने वाले भेदभाव पर पाबंदी लगा दी.

उच्च न्यायिक क्षेत्र में हमें ज़्यादा महिला न्यायाधीश क्यों चाहिए?

इस सवाल के जवाब में शोभा गुप्ता मुस्कुराते हुए कहा, “उच्च न्यायिक क्षेत्र में ज़्यादा महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए हम कोई वजह क्यों तलाश रहे हैं? समाज में 50 प्रतिशत महिलाएँ हैं, क्या ये वजह काफ़ी नहीं है? मैं ये नहीं मानती कि महिलाओं में ज़्यादा संवेदनाएँ होती हैं और वे अच्छे फ़ैसले दे सकती हैं. अब तक सुप्रीम कोर्ट में केवल आठ महिला न्यायाधीश रही हैं, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है कि महिलाओं के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट अच्छे फ़ैसले करने में नाकाम रहा है.”

शोभा गुप्ता ये भी बताती हैं कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के मामलों का फ़ैसला रोस्टर के आधार पर होता है, इसलिए महिला न्यायाधीशों को महिला मुद्दों पर फ़ैसला करने का मौक़ा मिलेगा और पुरुषों को केवल आपराधिक मामलों में यह संभव नहीं है.

हालाँकि जस्टिस मनोहर के मुताबिक़ इससे महिला वकीलों को भावनात्मक मदद मिलेगी.

स्नेहा खालिता भी ऐसा ही मानती हैं, “जब महिला वकील बेंच में महिला न्यायाधीशों को देखेंगी तो उन्हें भावनात्मक मदद मिलेगी.”

स्नेहा ने इस पूरे मामले पर कहा, “अदालतों में लैंगिक असमानता की बातें हो रही है, हम लोग घरेलू महिला को उनका उचित वेतन देने की बात कर रहे हैं. सबरीमाला का फ़ैसला आ चुका है, मुझे लगता है कि समय आ चुका है कि हम न्यायिक व्यवस्था के अंदर झाँक कर देखें और उसमें बदलाव लाएँ.”

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