Wednesday, July 28, 2021
27.1 C
Delhi
Wednesday, July 28, 2021
- Advertisement -corhaz 3

आजादी से पहले ही राजस्थान की धरती का नाम रोशन कर दिया – जानिए कैसे हुआ “डालमिया”का इतना नाम

आज भी हमारे क्षेत्र में जब कोई व्यंग्य किया जाता है तो बोलते है “तू कोई डालमिया है के ?” तो आज हम उन्हीं अरबपति डालमिया जी के बारे में चर्चा करेंगे। आज बात करेंगे एक ऐसे परिवार की जिसने आजादी से पहले ही राजस्थान की धरती का नाम रोशन कर दिया। हम बात कर रहे हैं राजस्थान के चिड़ावा के डालमिया परिवार की। डालमिया परिवार व्यापार में हमेशा ही कुशल परिवार था। साल 1935 में परिवार के बड़े भाई ने डालमिया सीमेंट की स्थापना की जिसे आज भी उनकी पीढ़ी संभाल रही है।

साल 1932-33 में रामकृष्ण डालमिया ने बिहार के निर्मल कुमार जैन के साथ चीनी मिल शुरू की और देखते ही देखते 1 वर्ष में यह मेल चालू हो गई। 1 साल में उन्होंने एक और चीनी मिल रोहतास इंडस्ट्रीज को भी शुरू कर दिया। कुछ वर्ष में जयदयाल डालमिया और रामकृष्ण डालमिया ने साथ में दनोट, डालमियापुरम, चरखी दादरी, कराची जैसे शहरों में भी अपना व्यापार शुरू कर दिया।

कई क्षेत्रों में थी रुचि

डालमिया परिवार की मशीनरी में रुचि थी। कई क्षेत्रों में उनका परिवार रुचि रखता था। फिर वह बैंकिंग क्षेत्र हो, मोटर वाहन का क्षेत्र हो,सीमेंट क्षेत्र हो आदि। अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को डालमिया परिवार ने ही हिंदी और बांग्ला में शुरू किया था। उन्होंने गोवन ब्रदर्स को भी खरीद लिया था। डालमिया परिवार उस समय में टाटा बिरला के बाद भारत में तीसरा स्थान रखता था।

जनकल्याण कार्यो में रखते थे रुचि

साल 1951 में डालमिया ब्रदर्स ने एक ट्रस्ट शुरू की जिसका नाम डालमिया सेवा संस्थान रखा गया था। इसके माध्यम से निजी अस्पताल, स्कूलों, विधवा घरों, धर्मशालाओं को चलाने का काम होता है। डालमिया ट्रस्ट भी डालमिया भाइयों ने शुरू की थी।

नेहरू के आलोचक थे डालमिया

dalmia and nehru 1200x675

रामकृष्ण डालिया शुरू से ही गौ हत्या विरोधी आंदोलन का खुलकर समर्थन करते थे। इसी से जुड़ा एक किस्सा आपको बताए तो उद्योग और देश को प्रभावित करने वाले और गौ हत्या रोकने के समर्थक रामकृष्ण डालमिया को जेल भी जाना पड़ा। असल में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के साथ उनका कुछ बातों को लेकर असंतोष रहता था। वह विभाजन और शरणार्थियों की दुर्दशा के लिए भी पंडित नेहरू की खुलेआम आलोचना करते थे।

इसी के चलते साल 1956 में विवियन बोस जांच आयोग बनाया गया था। आयोग नेहरू जी ने ही बनवाया था। इसके चलते डालमिया पर पैसों की हेराफेरी के साथ, शेयर बाजार की भी हेराफेरी का आरोप लगा। जिसके चलते डालमिया को अपनी कई कंपनियों को सस्ते भाव में बेचन पड़ा। सवाई माधोपुर में स्थित सीमेंट फैक्ट्री को भी उन्होंने इसी दौरान खो दिया। डालमिया के खुलेआम नेहरू का विरोध करने के चक्कर में उन्हें 3 साल जेल में काटनी पड़ी।

जनसेवा में हमेशा आगे

डालमिया परिवार जन सेवा में हमेशा से ही काम करता था। बाढ़ सूखा भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों को आर्थिक मदद के लिए डालमिया परिवार हमेशा से आगे रहता था। अपने गांव चिड़ावा में भी डालमिया परिवार के कई संस्थान आज भी चालू है जो वहां के लोगों के लिए जन कल्याण का कार्य करते हैं। परिवार के सदस्य जयदयाल डालमिया श्री कृष्ण जन्म स्थान सेवा संस्थान मथुरा के ट्रस्टी भी रह थे। उन्होंने उस पद पर रहते हुए विकलांग,जरूरतमंद व अंधे लोगों के लिए कई कार्य किए थे। वह लिखने का भी शौक रखते थे, उनकी 1971 में धर्म शास्त्र और अस्पृश्यता व प्राचीन भारत में गौ मांस की समीक्षा जैसी किताबे भी बाजार में आई थी।

देश के अमीर व्यक्तियों में से एक डालमिया परिवार आज इतिहास के पन्नो में धुंधला सा हैं। विद्वान इसका एक ही कारण मानते है वह है कि यह परिवार हमेशा नेहरू की नीतियों की आलोचना करता था। जन सेवा के इतने कार्य डालमिया परिवार ने आजादी के पहले व बाद दोनों समय किए। आज डालमिया परिवार की पीढ़ी अपने पारिवारिक कार्यभार, व्यापार को चला रही है और उनकी संपत्ति आज भी 30 बिलियन के करीब हैं। 

More articles

- Advertisement -corhaz 300

Latest article

Trending