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सरकार के आधार को वोटर ID से जोड़ने के फैसले पर विपक्ष क्यों उठा रहा सवाल?

मोदी सरकार ने मंगलवार को संसद में विपक्ष के कड़े ऐतराज के बाद भी चुनाव सुधार से जुड़े हुए बिल को पास कर दिया. सरकार का दावा है कि वोटर ID से आधार को जोड़कर फर्जी वोटरों की गड़बड़ी रोकी जा सकेगी.

अब ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जिस आधार के जरिए करीब साढ़े 4 करोड़ फर्जी गैस कनेक्शन और करीब 3 करोड़ फर्जी राशन कार्ड का पता चला क्या वो चुनाव सुधार की बुनियाद बनेगा.

वोटर कार्ड को आधार नंबर से जोड़ने के फैसले को जहां सरकार बड़ा चुनाव सुधार बता रही है वहीं विपक्ष इस पर सवाल उठा रहा है.

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आधार को वोटर कार्ड से जोड़ना क्यों जरूरी है  या फिर वोटर कार्ड के आधार से लिंक होने पर क्या होगा? ये भी सवाल उठ रहे हैं कि इससे आम आदमी की निजता को खतरा तो नहीं होगा?

जनता से जुड़े इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमने चुनाव आयोग के पूर्व चुनाव आयुक्त एस. वाय. कुरैशी, पूर्व चुनाव निदेशक मोहम्मद अमीन और देश के जाने माने साबइर लॉ एक्सपर्ट डॉक्टर पवन दुग्गल से बात की.

पूर्व चुनाव आयुक्त ने फैसले को बताया सही

साल 2015 में चुनाव आयोग ने अपने राष्ट्रीय मतदाता सूची शोधन और प्रमाणीकरण कार्यक्रम के रूप में मतदाता कार्ड और आधार संख्या को जोड़ने का काम शुरू किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर रोक लगाने के बाद चुनाव आयोग को अपना ये कार्यक्रम बीच में ही छोड़ना पड़ा था. 

अब चुनाव सुधार का बिल पास हो जाने पर खुशी जताते हुए पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाय कुरैशी ने इसे वक्त की जरूरत करार दिया है. उन्होंने कहा कि डुप्लीकेट वोटर बहुत हैं. EC की कोशिश रहती है कि इन्हें डिलीट करें. लोग एक जगह से दूसरी जगह मूव करते हैं. पिछले वाले को कैंसिल नहीं करते, ये सब लार्ज स्केल पर होता है, डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर से इस मामले में लिमिटेड कामयाबी ही मिलती थी.

बता दें कि देश में आधार की शुरुआत के दौरान ही चुनाव आयोग इस काम को अंजाम देना चाहता था लेकिन ये मामला विरोध की वजह से लटकता रहा था.

विपक्ष ने सरकार की मंशा पर क्यों उठाए सवाल

चुनाव सुधार बिल के विरोधियों की दलील है कि सरकार ये बिल ला ही नहीं सकती क्योंकि आधार एक्ट मतदाता सूची को लिंक करने की इजाजत ही नहीं देता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि आधार एक्ट वित्तीय और अन्य सुविधाओं को सही व्यक्तियों तक पहुंचाने का माध्यम है, जबकि वोटिंग एक कानूनी अधिकार है.

विपक्ष का कहना है कि आधार कार्ड पहचान का प्रमाण पत्र हो सकता है, नागरिकता का नहीं. विपक्ष की इन दलीलों का अपना आधार हो सकता है लेकिन एस वाय कुरैशी जैसे पूर्व चुनाव आयुक्त को ऐसा करने में फायदा ही फायदा नजर आता है. इलेक्शन कमीशन के नजरिए से तो फायदा ये है कि डुप्लीकेट वोटर पकड़ लिए जाएंगे और इससे इलेक्टोरल रोल को साफ किया जा सकेगा.

गौरतलब है कि अभी मतदाता पहचान पत्र को देश में आए हुए 3 दशक से भी कम वक्त गुजरा है. अगस्त 1993 में तब के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने मतदाताओं के लिए पहचान पत्र बनाने का आदेश दिया था.

सरकार का दावा, चुनाव प्रकिया में आएगी पारदर्शिता

वोटर कार्ड पहले सफेद रंग के कागज पर काले रंग से प्रिंट होता था लेकिन 2015 के बाद सरकार ने एटीएम कार्ड के आकार के प्लास्टिक के रंगीन वोटर आईकार्ड की शुरुआत की थी.  अब मोदी सरकार इस वोटर कार्ड से आधार को जोड़ने जा रही है ताकि चुनावी प्रक्रिया को पहले से कहीं ज्यादा निष्पक्ष किया जा सके.

हालांकि इसको लेकर विपक्ष का कहना है कि सरकार जिस तरह से हड़बड़ी में ये बिल लेकर आई. उससे सरकार के इरादों पर शक होता है.

लोकसभा में सिर्फ 26 मिनट में ये बिल पास हो गया वहीं राज्यसभा में विपक्ष की फूट ने सरकार का रास्ता साफ कर दिया. हालांकि इस बिल का विरोध करने वालों का तर्क है कि वोटर कार्ड को आधार से लिंक करना निजता के अधिकार का सीधा सीधा उल्लंघन है. 

पूर्व चुनाव आयुक्त ने बताया ये फैसला क्यों था जरूरी

आधार को वोटर कोर्ड से जोड़ने के इस बिल को लेकर पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाय कुरैशी ने कहा कि अगर एक वोटर त्रिवेंद्रम में भी है और गुड़गांव में भी है तो नेशनल डेटा होगा तो आसानी होगी. आधार से ऐसा करने में आसानी होगी, जो एतराज है उसे मैं अच्छी तरह समझ नहीं पाया हूं, इससे क्या एतराज है, अगर प्राइवेसी की बात है तो कौन सी चीज है जो पब्लिक के बीच पहले से नहीं है, ये तो सिर्फ आइडेंटीफिकेशन के लिए यूज होगा.

चुनाव में बोगस वोटिंग रोकने के लिए हर दल अपने कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देता है क्योंकि ये बोगस वोट जीत और हार को भी तय करने की क्षमता रखते हैं. इसकी शिकायत लेकर राजनीतिक दल चुनाव आयोग के पास जाते भी हैं.

इससे चुनाव होगा और निष्पक्ष: पूर्व चुनाव निदेशक

सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए पूर्व चुनाव निदेशक मो. अमीन ने कहा कि पहले विपक्ष के सभी लोग हमेशा चुनाव आयोग को निशाने पर लेती थीं कि यहां पर धांधली की जाती है, इस निर्णय के बाद चुनाव आयोग पहले से कहीं निष्पक्ष हो जाएगा.

इसलिए कहा जा रहा है कि आधार का वोटर कार्ड से लिंक होना निष्पक्ष चुनाव की गारंटी बन सकता है लेकिन सरकार ने अभी इसे फिलहाल वैकल्पिक ही रखा है. यानी अगर आप अपने वोटर कार्ड को आधार से नहीं जुड़वाना चाहते तो इसके लिए आपको बाध्य नहीं किया जाएगा. 

अधिकारों को सुरक्षित करने वाला फैसला: लॉ एक्सपर्ट

हालांकि लोगों के मन में एक सवाल यह भी उठता है कि जो लोग आधार को वोटर कार्ड से लिंक नहीं करवाएंगे उन्हें क्या नुकसान उठाना पड़ सकता है?

इसको लेकर देश के जाने माने साइबर लॉ एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने बताया कि वोटर कार्ड से आधार लिंक करने पर आसमान नहीं टूटेगा ये स्वैच्छिक है.

अगर आप कर लोगे तो अगली बार जब आप वोट डालने जाते हैं और वहां सेंटर पर आपसे कहा गया कि आपका तो नाम है नहीं आपके नाम से वोट डाल गया इस तरह की घटनाएं बहुत कम हो जाएंगी. आपके नाम पर आपका वोट कोई और नहीं डाल पाएगा जिससे आपका अधिकार ही सुरक्षित होगा.

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